Friday, September 10, 2010

अजीब शख्श था चाहत की बयार छोड़ गया .

अजीब शख्श था चाहत की बयार छोड़ गया
वह अपने इश्क में मुझे बीमार छोड़ गया।
मेरी नज़रों में नज़रे डाल कर के वह
फिर मिलके रहने का करार छोड़ गया।
उसे पता था तन्हा न रह सकूँगा मैं
यह हवा यह फिज़ा यह बहार छोड़ गया।
जिंदगी चाहत से ही तो चला करती है
दिल में यह सबक भी तैयार छोड़ गया।
आसमां हूँ तेरी प्यास बुझा दूंगा जरूर
वह वादों की फसल तैयार छोड़ गया।
मुझे खुद से ज्यादा यकीं उस पर हुआ
हर राह में एक मंजिल तैयार छोड़ गया।
मैंने देखा था जाने के बाद ख़त उसका
अपनी शायरी के अशआर छोड़ गया।
रस्मो रिवाज़ से घबरा गया था वह
मेरे हिस्से में लम्बी इंतज़ार छोड़ गया।
दिल की वादियाँ अँधेरे में डूब गयी थी
वह दूर जलते चिराग बेशुमार छोड़ गया।

1 comment:

  1. उसे पता था तन्हा न रह सकूँगा मैं
    यह हवा यह फिज़ा यह बहार छोड़ गया।

    जिंदगी चाहत से ही तो चला करती है
    दिल में यह सबक भी तैयार छोड़ गया।
    आसमां हूँ तेरी प्यास बुझा दूंगा जरूर
    वह वादों की फसल तैयार छोड़ गया।
    मुझे खुद से ज्यादा यकीं उस पर हुआ
    हर राह में एक मंजिल तैयार छोड़ गया।
    मैंने देखा था जाने के बाद ख़त उसका
    अपनी शायरी के अशआर छोड़ गया।


    आदरणीय अद्भुत लिखा है आपने, बेहद प्रभावी एक-एक शब्द आपकी गहरी सोच और अनुभवों के निचोड़ को दर्शा रहा है

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