Thursday, March 14, 2019

     

   तिरोहे तीन मिसरी शयरी
इश्क़ का अलग दस्तूर देखा
जिनको भूलाने में ज़माने लगे
मुझे देख वह मुस्कराने लगे
दिल से निकल गए थे जिनके
दिल में फिर वो घर बसाने लगे
हम दिल ही दिल शरमाने लगे
इश्क़ अदा है वफा है या दुआ
वो सबकी बिसात बिछाने लगे
हम भी खुद को समझाने लगे
कुछ सिफत थी उन आखों में
हम आईना उनको दिखाने लगे
और खुद से नजरें मिलाने लगे
देर आये दुरुस्त आये तो सही
हम भी दिल को समझाने लगे
संग साथ जिन्दगी बिताने लगे
मुकम्मिल है शायरी मेरी यह
तीन मिसरी शायरी बनाने लगे
तिरोहे ह्म्म गाकर सुनाने लगे
--- डॉ सत्येन्द्र गुप्ता

Monday, March 11, 2019





   एक कविता तिरोही
चुप रहती है जब तक़ बोतल मे बंद है
बाहर निकलते ही गज़ब बहुत ढ़ाती है
पैमाने में भरते भरते भी छ्लक जाती है
कितना खूबसूरत अंदाज़ है इसका भी
होठों को चूमने को बेताब हुई जाती है
महबूब बनकर गले से लिपटती जाती है
बहुत बवाल मचाती है यह शराब भी तो
जैसे जैसे गले से नीचे उतरती जाती है
रंगत अपनी असली दिखाती जाती है
आदमी को आदमी रहने नहीं देती वह
रह रह कर उसके सर पर चढ़ी जाती है
अच्छे आदमी को बना शराबी जाती है
------ डॉ सत्येन्द्र गुप्ता



     तिरोहे तीन मिसरी शायरी
कोई वायदा ना कोई क़रार लेकर आए
वो अपना कमसिन शबाब लेकर आए
पहली मुहब्बत का खवाब लेकर आए
कुछ दिखाया न कुछ छिपाया उन्होंने
हया का वो ऐसा नक़ाब लेकर आए
अदाओं की हसीन क़िताब लेकर आए
चेहरे पर भी नूर ए इश्क़ चमक रहा था
जैसे चौदहवीं का माहताब लेकर आए
दिल को भी अपने बेताब लेकर आए
सब्र का पैमाना छलक उठा मेरा भी तो
आखों से पीने की शराब लेकर आए
आंखों मे सुरूर बे हिसाब लेकर आए
अजब अंदाज़ था दिल की चोरी का भी
क़तरा क़तरा अपना हिसाब लेकर आए
मेरे मुहब्बत का भी सैलाब लेकर आए
------डॉ सत्येन्द्र गुप्ता




    तिरोहे तीन मिसरी शायरी
शहीद हुए पुलवामा में जो श्रद्धान्जली उन्हें देने को
वंदे मातरम की हमने अब अलख नई जगा दी है
आतंकवाद की होली भी पार सरहद ही जला दी है
नहीं खेलने देंगे किसी को भी मां तेरे सम्मान से हम
सरफिरे लोगो को हमने यह बात अब समझा दी है
मां तेरे सपूतों ने तेरी रक्षा करने की दिल
में ठानी है
न छीन सकेगा कोई मां तुझसे तेरे स्वाभिमान को
घर घर में जन्मे भगत सिंह रानी लक्ष्मीबाई है
नए अंदाज़ में मां तेरी जय जयकार हमें
सुनानी है
बरसों गुलामी सह हमने दौलत देश भक्ति
की कमाई थी
न लुटने देंगे इस सम्पदा को कसम सबने ये
खाई है
ये साहस धैर्य और देशभक्ति मां तुझ पर ही बलिहारि है
जंग लगे हथियारों पर हमने अब धार तेज़
लगवा दी है
नए अंदाज़ में वंदे मातरम की आवाज भी
सबको सुना दी है
आतंकवाद की होली हमने पार सरहद के जला दी है
----- डॉ सत्येन्द्र गुप्ता
   

    तिरोहे तीन मिसरी शायरी
इश्क़ का उनको तजुर्बा नहीं है
कहने को वो आशिक़ पुराने हैं
अब जाना वो मेरे भी दिवाने हैं
नाम हमारा आया साथ में जब
तो कहीं जाकर मुझे पहचाने हैं
मुझे देखकर ही लगे शरमाने हैं
लोग लम्हों की कीमत न जाने
लम्हा लम्हा कर बीते ज़माने हैं
इश्क़ के वादे सबको निभाने हैं
-----डॉ सत्येन्द्र गुप्ता
   



       तिरोहे-
तीन मिसरी शायरी
चांद को पा लेने की हसरत न मिटी
बता ज़मीं पर उसको क़ैसे उतारें हम
दूर से भी उसको कितना निहारें हम
फासला न रखें तो फिर क्या करें हम
किस तरह साथ उसके चला करें हम
उसके गम का आखिर क्या करें हम
दिल का दर्द तस्वीरों में भर दिया हमने
लकीरों को कितना और गहरा करें हम
क्यों बार बार आईना ही देखा करें हम
मिला है मुझे ही हमसफर ऐसा क्यों
कैसे उसका चरचा किया करें हम
बता क्यों उसका ही सजदा करें हम
--डॉ सत्येन्द्र गुप्ता