Sunday, November 12, 2017

सांप लिपटे देखे जब से आस्तीन पर
यकीन नहीं हुआ हमें अपने यकीन पर
बेखबर हम थे मगर तुम तो वाकिफ़ थे
तुमने यक़ीं कर लिया उस कमीन पर
जलजलों का सिलसिला खत्म न हुआ
संभल कर चलना ज़रा इस जमीन पर
दिल की तमाम हसरतें दिल में रह गई
कैसा कहर बरपा था उस गमगीन पर
जिंदगी अब जाने किस जानिब ले जाए
जाने क्या क्या लिखा है इस जबीन पर
सूखी हुई शाखें अभी तक भी शादाब हैं
कुछ फूल महक रहे हैं बंजर जमीन पर
आज आइना देखने में उनसे चूक हो गई
हर निगाह टिकी थी लिबास महीन पर
जबीन - माथे
शादाब - हरी भरी
कद से बड़ा ख्वाब देख लिया
दिन मे ही माहताब देख लिया
जिंदगी की कमी पूरी हो गई
आज मैंने वो शबाब देख लिया
सवाल करने की हिम्मत न हुई
जब उनका जवाब देख लिया
हाले दिल उनहे सुनाते भी क्या
उनहोंने सारा हिसाब देख लिया
रात ने करवट जरा सी बदली
आखों ने आफताब देख लिया
खाली पीली मुंह कड़वा हो गया
पीकर के मैंने शराब देख लिया

Sunday, July 16, 2017

होशियार का मतलब फनकार नहींं होता
हर हुनरमंद भी तो कलाकार नहींं होता
मिला जो आज मुझको हंसकर बोला वो
हर गली कूचे मेंं भी तो बाजार नहींं होता
एक बार ही उसको जरा गौर से देखा था
अक्सर ऐसा भी तो बार बार नहींं होता
जो दिल मेंं बसा है वह चांद सा लगता है
चांद का भी तो हर रोज दीदार नहींं होता
पुरानी एलबम में एक ही तस्वीर झूठी है
बचपन का वो प्यार क्या प्यार नहींं होता
तेरी नफरत बनी रहे उम्र भर सदा यूं ही
अब हमसे भी इश्क़ का इजहार नही होता
मालूम हुआ है मुझको तुम्हारी ही जुबानी
मैं अपने फैसले पर शर्मसार नही होता
मेरे कमरे का आईना भी नाराज है मुझसे
मैं ऐतबार दिलाऊ उसे ऐतबार नही होता
न ही मंजिल का पता नहीं रस्तों की खबर
ऐसे भी तो सफर पूरा कभी यार नही होता
--------- सत्येंद्र गुप्ता

Monday, May 29, 2017

वह  रंज़ो ग़म  तेरी  बेवफ़ाई का
सिलसिला था वो मेरी तन्हाई का।

तू गया तो लौटके आ न सका था 
क्या सबब बताता मैं  जुदाई का।

तेरे चेहरे पर लिखा पढ़ा था मैंने
मेरा चरचा था न था रुसवाई का।

वही छोड़के चल दिया तन्हा मुझे
दावा किया था मेरी रहनुमाई का।

रात भर दिल में दर्द  उठा था मेरे
गूँज़ता रहा सुर उसी शहनाई का।

आज फिर  दिल  परेशान है बहुत
याद आ रहा है किस्सा सगाई का।

शहरे वफ़ा में दर्द का साथी न कोई
डर आज भी लगता है रुसवाई का।

खुशबु तेरी अब भी मिलती है मुझसे
एहितराम करती है मेरी तन्हाई का।
     
   एहितराम  - इज़्ज़त

         ------सत्येंद्र गुप्ता

Saturday, February 18, 2017

उनके पास जाने का बहाना नहींं मिला
प्यार को नापने का पैमाना नहींं मिला
कितने ही पागल हो गए जुनूने इश्क़ में
किसी को भी मगर हरजाना नहींं मिला
मुहब्बत तो हमारे भी दिल मेंं बसी थी
हर वक्त मगर समा सुहाना नहींं मिला
मुहब्बत का दम भरते तो हजारों मिले
हद से गुजरा कोई दिवाना नही मिला
जिंदगी का मौत से बना है सिलसिला
आबे हयात का उसे खजाना नहींं मिला
जगमगा उठता है ओस मे नहाकर फूल
हमको तो इसका भी बहाना नहींं मिला
सिक्का खोटा था कोने में ही पड़ा रहा
उसको कभी उसका घराना नही मिला
मिली कामयाबी मगर खुशी नही मिली
मुझको रहमतों का नज़राना नहींं मिला 
मैंने उसको अपना जिगर दे दिया
उसने गम मुझे इस कदर दे दिया
मेरा जिगर छलनी करने के वास्ते
मेरे हाथ मेंं अपना खंजर दे दिया
उसका मुकद्दर संवारने के लिए
 मैंने उसे अपना दस्ते हुनर दे दिया
छांह भी मयस्सर न होसकी कभी
 सूखी शाखों का मुझे शज़र दे दिया
आसूं तक अपना चलन भूल गए
मुझको ऐसा जख्मे जिगर दे दिया
अपनी बेबाकी से ड़र लगता है
दिल की मनमानी से ड़र लगता है
जिंदगी तुझसे शिकवा नहींं कोई
मौत की दावेदारी से ड़र लगता है
मुद्दत बाद मिले हैंं फुरसत से हम
वक्त की मेहरबानी से ड़र लगता है
कईं पागल हो गए जुनूने इश्क़ में
इश्क़ की वफादारी से ड़र लगता है
मैं अपनी रजा भी न बता पाया
मुझे अपनी खुद्दारी से ड़र लगता है
मेरी अमानत संभाल कर रखना
 मुझको निगहबानी से ड़र लगता है
ख्वाहिशें ही बांझ रह गई सारी
अब आंगन खाली से ड़र लगता है
बेबाकी - साफ कहना
निगहबानी - देखरेख