Thursday, June 16, 2011

मेहमान नवाज़ी का ज़माना नहीं रहा
अब अगवानी का ज़माना नहीं रहा।
राह में मुश्किलें भी पड़ी हुई हैं बहुत
उतनी आसानी का ज़माना नहीं रहा।
हिम्मत पूरे दम ख़म के साथ लौटी है
अब मायूसी का ज़माना नहीं रहा।
हर एक शख्श पायेगा अपनी ज़गह
अब मजबूरी का ज़माना नहीं रहा।
ज़माना मांफ नहीं करेगा कभी भी
अब नादानी का ज़माना नहीं रहा।


4 comments:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी है!

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  2. सटीक अभिव्यक्ति ..अब तो स्वार्थ का ज़माना है

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  3. सही कहा.
    घुघूती बासूती

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  4. बहुत सटीक प्रस्तुति..

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