Saturday, December 21, 2013

अब किसी बात का भी अंदाज़ नहीं होता
हर वक़्त एक सा तो मिज़ाज नहीं होता।
हैरान होता है दरिया यह देख कर बहुत 
क्यूँ आसमां ज़मीं से  नाराज़ नहीं होता।
खिड़की खोल दी,उन की  तरफ़ की मैंने
अब परदे वालों का  लिहाज़  नहीं  होता।
गुज़रा हुआ हादसा फिर से याद आ गया
अब काँटा भी  नज़र- अंदाज़ नहीं  होता।
नहीं होता ज़ब कभी कुछ भी, मेरे घर में
दिल तब भी  मेरा  मोहताज़ नहीं होता।
अस्पताल तो बहुत सारे हैं इस शहर में
ग़रीबी का ही  कहीं , इलाज़  नहीं होता।
 



 

Thursday, December 19, 2013

हमने ज़न्नत का इक शहर देखा है
हमने उनके, मन का नगर देखा है।
चाँद शरमा के छुप गया, बदली में
उन के हुस्न का यह असर देखा है।
ओस में नहाया हुआ उनका हमने
फूल  सा  यौवन -शिखर  देखा है।
सर्द रुख़सार से  गर्म होठों तलक़
सियाह  ज़ुल्फ़ों का क़हर देखा है।
नज़रे-साहिल से नज़रें चुरा हमने
दरियाए  हुस्न में तैर कर देखा है।
देखा है वह सर-आ-पा हुस्न हमने
रेशमी रूप का वह समंदर देखा है।
वक़्त का क़ाफ़िला भी, रुक गया
उन्होंने जब हंस के, इधर देखा है।
हमें अपना बना लिया, जब चाहा
उन्हें मेहरबान इस क़दर देखा है।
नशा नहीं उतरा, कभी भी हमारा
हमने उम्र का वो भी सफ़र देखा है।
   

Friday, November 29, 2013

जवाब जिसका हो,लाज़वाब नहीं होता
ख्वाब जो सच्चा हो, ख्वाब नहीं होता।
उस की हर किरन ही बड़ी नाज़ुक सी है
माहताब कभी भी आफ़ताब नहीं होता।
ज़मीन छूने लगती है ,आसमान  जब
तो फ़िर कीमतों का हिसाब नहीं होता।
उस के नसीब में है, मुफ़लिसी का दर्द
ग़रीब ग़रीब होता है ,ज़नाब नहीं होता।
हर एक बात की इल्तिज़ा करता है वो
उस की शराफ़तों का ज़वाब नहीं होता।
भाप बन कर उड़ गया, सारा ही पानी
इन  आँखों में  अब सैलाब नहीं होता।
उसकी बेरुखी पर यह सवाल उठता है
सूखी नदियों में क्यों आब नहीं होता।
तौबा कर ली है जब से पीने की हमने
अब पीने को  दिल, बेताब नहीं होता।




 

Sunday, November 17, 2013

उम्र प्यार की अब कम हो गई 
यह सोचकर आँख नम हो गई।
चाँद  गोद में कभी आया  नहीं
ज़िन्दगी अँधेरे में गुम हो गई।
रिश्तों को भुनाते भुनाते ही तो
दिलों की चमक ख़त्म हो गई।
लगावट दिलों में अब रही नहीं
हँसी भी होठों पर हिम हो गई।
उम्र भर धूप में रहते रहते अब
छाँव में ये आंखें बेदम हो गई।
सहरा में भटक लिए इतना हम 
तिश्नगी  होठों की कम हो गई।
मेरी साख़ पर अंगुली क्या उठी
ज़िन्दगी ही अब सितम हो गई। 
 

Saturday, November 16, 2013

जिस को भी मैंने  है हवा से बचाया
उस चिराग़ ने ही  घर मेरा जलाया।
हमसफ़र बनकर साथ चला जो भी
तन्हाई का उसने ही फ़ायदा उठाया।
सूखे लब हैं ,यह भीगी भीगी  आँखें
बहार ने भी कैसा यह गुल खिलाया।
क़द से बाहर तो निकल आया था मै
ख़ुद से ही बाहर  न मैं निकल पाया।
ख़ुदा को खोजने निकला था, मैं तो
मुझ को  ढूँढता फिरा मेरा ही साया।
सूने दालान यह खिड़कियां वीरान 
घर का मेरे, यह क्या हाल बनाया।
हज़ार खिड़कियां थी, दिल में  मेरे
किसी को  भी मैं, नहीं खोल पाया।
तीर की  माफ़िक़, चुभी अंगुली वो
किसी ने जब मेरा ज़ख्म सहलाया।
मेरे ज़ख्मों की महक़ कहती है यह
तू भी तो मुझ को , नहीं भूल पाया।      

Tuesday, November 5, 2013

जलते सवालों के सुलगते ज़वाब कौन देगा
जो रात बीत गयी उस के ख्बाब कौन देगा।
इक आग होनी चाहिए, रौशनी के लिए भी
इस अँधेरे में उजालों का हिसाब कौन देगा।
इतनी ज़यादा मिल गई हमें गमों की दौलत
ज़र्द हवाओं को खुशबु-ए -गुलाब कौन देगा।
उदासियाँ सी बिखरी पड़ी हैं ,चारों ही तरफ
इस मौसम को बहार का ख़िताब कौन देगा।
हमारी तमन्ना को जगाया और बुझा दिया
हमारे ज़ुनून को अब हवा बेताब कौन देगा।
आज़ की शब् चाँद की चमक बहुत फीकी है
आज़ चांदनी को हुस्ने-माहताब कौन देगा।
हवा का एक झोंका आया, सब बिखर गया
अब मुहब्बत में भरोसे का हिसाब कौन देगा।

 

Tuesday, October 29, 2013

तारीख़ बदलने से तक़दीर नहीं बदलती
वक़त के हाथ की शमशीर नहीं बदलती।
मैं ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी तलाशता रहा
ज़िन्दगी , अपनी ज़ागीर नहीं बदलती।
कितने ही पागल हो गये ज़ुनूने इश्क़ में
मुहब्बत  अपनी तासीर  नहीं बदलती।
प्यार ,वफ़ा,चाहत ,दोस्ती व  आशिक़ी
इन किताबों की तक़रीर नहीं बदलती।
अपनी खूबियाँ, मैं किस के  साथ बाटूं
अपनों के ज़िगर की पीर नहीं बदलती।
कईं बार आइना भी मुझसे लड़ा लेकिन
मेरी सादगी  ही  ज़मीर नहीं  बदलती।
बहुत ग़ुरूर है, चाँद को भी  चांदनी पर
चांदनी भी अपनी तस्वीर नहीं बदलती।
पड़ गई आदत मुझे साथ तेरे चलने की
मेरी बेरूख़ी भी , ज़ागीर नहीं बदलती।
मेरा वायदा है , मैं  निभाऊंगा भी ज़रूर
मेरे मनकों की भी तनवीर नहीं बदलती।