Thursday, June 19, 2014

तपते मौसम  की गर्म हवाएं मार डालेंगी
तूफ़ान न गुज़रा अगर सदाएं मार डालेंगी।
मोहब्बतें  मारेंगी न नफ़रतें मारेंगी  हमें
ख़ामोश निगाहों की सदाएं मार डालेंगी।
छोड़कर न जाएगी न जाने देगी ज़िंदगी
ज़िंदा रहने की हमें दुआएं  मार डालेंगी।
हर किसी से प्यार करना अपनी आदत है
क्या करें हमें हमारी वफ़ाएं मार डालेंगी।
खुलासा हाले दिल का होता तो अच्छा है
वरना उनके हंसने की अदाएं मार डालेंगी।
शहर से रौनक़े- वफ़ा ही चली गई अगर
दिल पे दर्ज़  उनकी ज़फ़ाएं मार डालेंगी।
सूरते हाल बिगड़ती चली गई अगर यूं ही
आंच देती ये दर्द की हवाएँ मार डालेंगी। 

Sunday, June 1, 2014

खुशबु की मानिंद बिखरते चले गए
हम उम्र के साथ निखरते चले गए। 
दिन में लड़ाते रहे  आँख सूरज  से
रात में चांदनी से लिपटते चले गए।
खुशबु वही, फूल वही, हम वही रहे
मिज़ाज वक़्त का बदलते चले गए।
उड़ाके रंग दिल से आँखों से होंठो से
क़रीब से ज़िंदगी के गुज़रते चले गए।
लाख बवंडर मचते रहे सीने में मगर
समंदर बनकर हम मचलते चले गए।
मोहब्बत को मुझ पर पूरा यक़ीन था
तालाब उसकी  पूरी करते चले गए।
अंगड़ाइयाँ आज़ भी महकती हैं मेरी
आँधियों को खबर ये करते चले गए।
वो तकते रहे  हसरत लिए हुए  हमें
हम शमां की तरह पिघलते चले गए।   

Friday, May 23, 2014

हम अपने गुमान में कब तक रहते
दूसरे के मक़ान  में कब तक रहते।
एक दिन ज़मीन पर आना ही  था
हम  आसमान में कब तक रहते।
दिल में नफरतों का समंदर लेकर
उनके दरमियान में कब तक रहते।
 रास न आई हवाओं  की सवारी
हम ऊँची उड़ान में कब तक रहते।
बहाव हवाओं का इतना तेज़ था
परदे  दरमियान में कब तक रहते।
कभी महकते थे  संग में फूलों की
ख़ुश्बु ए बागान में कब तक रहते।
दिल में भी  शोर शराबा बहुत था
तन्हां  बियाबान में कब तक रहते।
बहुत लिया सब्र का इम्तिहान हमारे
हर वक़्त इम्तिहान में कब तक रहते।
बच्चे का सा बिगड़ा दिल है अपना
किसी के एहसान में कब तक रहते। 

Friday, May 9, 2014

सदियां गुज़र गई उन्हे वार करते
किस किस पर हम एतबार करते।
खरा न उतरा कोई अपने वादे पर
इश्क़ का हम  कैसे इज़हार करते।
बस्ती वही है लोग भी सब वही हैं
दिल को हम कितना बेक़रार करते।
आदत कहूं लत कहूं य बेबसी इसे
उम्र गुज़र गई अपनी तक़रार करते।
तस्वीरों के दाग़ उभर आया करते हैं
आईने को हम ही क्यूँ दाग़दार करते।
सिखा  दिया ज़माने ने बेअसर रहना
वरना  दुनिया  हम ही गुलज़ार करते।
आँखों में इंतज़ार का मंज़र रह गया
ज़िंदगी को कितना हम दुशवार करते।
खाते हैं क़समें भी हम बहुत ही कम
वो कहते हैं यूं तो नहीं इज़हार करते।
मेरी भी सुन लेगा कभी तो ख़ुदा भी
तमन्नाओं को नहीं हम बीमार करते।

Thursday, March 20, 2014

सुबह सवेरे हम ईमानदार होते हैं
दिन के वक़्त हम रोज़गार होते हैं।
बदलता रहता है क़िरदार हमारा
शाम ढले हम घर परिवार होते हैं।
और दिन हमको फ़ुर्सत नहीं होती
छुट्टी के दिन हम गुलज़ार होते हैं।
भीड़ से जब, छंट जाते हैं हम तो
वक़्त की फ़िर हम रफ्तार होते हैं।
चाहत , वफ़ा , दोस्ती , आशिक़ी
इन रंगों के फिर तलबगार होते हैं।   

Sunday, February 23, 2014

किसी की साख़  किसी के नाम हो गई
हमारी वहशत हम पर इल्ज़ाम हो गई।
इश्क़ में डूबकर, मुहब्बत जिसने  की
मुहब्बत अक्सर वही  बदनाम हो गई।
महफ़िल में इस क़दर रु ब रु हुए वह
उनकी अदा पर चरचा तमाम हो  गई।
दीवानगी का सबने इज़हार यूँ  किया
महफ़िल सारी उनके ही नाम हो गई।
हमें कड़े वक़्त का ही अंदाज़ न हुआ
उजालों में यह तो लगा शाम हो गई।
बहुत ढूँढा ,मुक़द्दर का पता न मिला
मुस्कराते रहे हर शय नीलाम हो गई।
उम्मीद पर ही जिए जा रहे हैं हम तो
बोझ उठाते हुए उम्र तमाम  हो गई।
टूट तो गए हम मगर झुके नहीं कभी
मेरी खुददारी  ही  मेरा इनाम हो गई।
सुपुर्द किया ख़ुद को जब से ख़ुदा के
ज़िन्दगी ही मेरी अब क़लाम हो गई।
       क़लाम - कविता
  
 

Saturday, February 15, 2014

रंगो खुशबु से गुलज़ार हम भी हैं
इस ज़माने के क़िरदार हम भी हैं।
बदलते रहे ,मौसम के साथ  हम
उसूलों पर क़ायम यार हम भी हैं।
तुझे हुस्न की दौलत मिली है तो
हुस्न के नाज़- बरदार हम भी हैं।
अपनी कोई  निशानी तू देदे मुझे
तेरी खुशबु के तलबगार हम भी हैं।
छुप छुप के चलती हैं हवाएं यहाँ
अब इतने तो समझदार हम भी हैं ।
बेवज़ह शाम तक तू भटकता रहा
हवाओं के तो कर्ज़दार हम भी हैं।
तज़वीज़ करदे अब कोई सज़ा मुझे
तेरी बेबसी के गुनहगार हम भी हैं।
खोटे सिक्के सही पर वज़नी हैं हम
उसकी रहमत के हक़दार हम भी हैं।