Tuesday, December 11, 2018

   तिरोहे ----
             तीन मिसरी शायरी 

इश्क़ की राह में खतरे ही खतरे हैं
आदमी खुद से बेख़बर हो जाता है
इश्क़ भी तो दर्दे जिगर हो जाता है

दम  घुटने  लगता है  महफ़िल  में
दिल खामोश समन्दर  हो जाता है
आबे- हयात भी ज़हर  हो जाता है

रंग उड़ जाते हैं तस्वीर के सारे ही
हैरान देखकर मुसव्विर हो जाता है
दिल  हसरतों की  क़ब्र हो जाता है

यह सिफ़त आदमी में  ही देखी  है
या तो फिर वो सिंकंदर हो जाता है
दुआओं में उसकी असर हो जाता है

या  इश्क़ में बावला रहता था कभी
मोहब्बत  में वही  अमर हो जाता है
या फिर क़िस्सा ऐ  शहर हो जाता है
 
       ------- डॉ  सत्येंद्र गुप्ता



No comments:

Post a Comment