Monday, August 15, 2011

पहरों फूलों की निगहदारी नहीं होती
नसीब की मेहरबानी हर घडी नहीं होती।
जरूरत तो पूरी हो जाती है फकीर की
ख्वाहिश बादशाह की पूरी नहीं होती।
महल ख्वाबों का कब तलक सजाओगे
सन्नाटों में कोई बस्ती बसी नहीं होती।
खुद्दारी तेरी ठीक है तो मेरी भी ठीक है
जिंदगी बेदाम किसी की भी नहीं होती।
पतझड़ की रुत आती है तो कह जाती है

सूखे जर्द पत्तों में जिंदगानी नहीं होती
अपनी ही कुछ मजबूरियाँ होंगी वक़्त की
वरना बेताल्लुकी कभी बढ़ी नहीं होती।
नई तरह की कैफियत होती है दिल में
महफ़िल अदब से जब सजी नहीं होती।

जिंदगी बिन बात के ही ज़लील कर देती
अगर सलीके से इसे हमने जी नहीं होती।

निगह्दारी- देखभाल





2 comments:

  1. स्वतन्त्रता दिवस के पावन अवसर पर बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  2. waah sir ji dil ko chute hain sabhi shabd... bas ek request hai ki font size thoda bada dijiyee...

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