Saturday, September 10, 2016

बेग़ुनाह को उसने मुज़रिम बना दिया 
ख़रोंच को कुरेद कर ज़ख़्म बना दिया !

उसका दर्द  मेरे दर्द दर्द से ज़्यादा था 
दर्द को ही मैंने तो मरहम बना दिया !

होंठ भी  हमारे अब  इंचों में हंसते हैं 
ख़ुशी को जाने क्यों मातम बना दिया !

आदत पड़ गई मैं को हम कहने की 
एक अकेले मैं को भी हम बना दिया !

मैं उसके वास्ते कुछ भी न कर सका 
उसने मुझे  शर्बते शबनम बना दिया !

खुली जो आँख तो मैं दामन भिगो गया  
 दर्द को मैंने अपना  अहम् बना दिया !

रोती रही गोपियां कृष्ण के ही विरह में 
किस पत्थर को हमने सनम बना दिया !

एक खूबसूरत ग़ज़ल लिखने को  मैंने 
दिल को ही सुनहरी क़लम बना दिया !

         -------सत्येंद्र गुप्ता 


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