Sunday, February 15, 2015

अँधेरा गहरा था  दिखता कैसे
जलते अंगारो पर  चलता कैसे।
शीशा टूट गया था फेंकना पड़ा
दिल टूट गया था फेंकता कैसे।
बहुत तराश कर लिखा गया था
तेरा नाम दिल से  मिटता कैसे।
कमरे तक आई थी खुशबु तेरी
बाँहों में अपनी उसे भरता कैसे।
बहुत गहरे निशां देकर गया था
ज़ख़्म ताज़ा था तो सूखता कैसे।
आइना टूटा हुआ  जुड़ तो जाता
चेहरा  सालिम फिर दिखता कैसे।
मुहब्बत मांग  कर नहीं ली जाती
मैं अब्र बन कर भी बरसता कैसे।
अजब  आलम रहा बेचारगी का
अभी ज़िंदगी थी तो मरता कैसे।
बेहद हसीन थी  लौटी नहीं  कभी 
मैं  अपनी जवानी को भूलता कैसे। 
  

1 comment:

  1. बहुत बढ़िया ब्लॉग है आदरणीय आपका अभी तक पहुँच नहीं पाए इसका दुःख है

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