चाँद को छत पर चढ़ कर नहीं देखा
मैंने तुम्हे कभी जी भर कर नहीं देखा।
दम ही दम भरते रहे मुहब्बत का तुम
तुमने भी कभी मुड कर नहीं देखा।
आरज़ू तो करते रहे तुम एहतिराम की
मैं जिंदा हूँ कि नहीं आकर नहीं देखा।
मैं गम को भीतर ही सिमेट तो लेता
बदकिस्मती से मैंने समंदर नहीं देखा।
मेरे घर के आईने को एक ही मलाल है
किसी ने भी उसमे संवरकर नहीं देखा।
क़दम चूमने को बेताब थी खुशियाँ
मैंने ही उस रस्ते पे चलकर नहीं देखा।
एहतिराम- सम्मान
सुंदर अभिव्यक्ति ,अच्छी गजल , बधाई
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