लकीर तेरी लकीर से मेरी बड़ी हो गयी
लकीरे ही अब अना आदमी की हो गयी।
कुछ और किसी को भी अब सूझता नहीं
कमी आदमी की बड़ी एक यही हो गयी।
माफिक नहीं हैं हालात जल्द बदल जायेंगे
तकदीर कहाँ खराब फिर अपनी हो गयी।
जीतना किसी न किसी को तो था जरूर
गम क्यों शिकस्त आज अपनी हो गयी।
होसला दिल में है अगर जिंदा उमंग है
जमाना देखेगा कल ख़ुशी अपनी हो गयी।
achchha laga!
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