Friday, September 13, 2019


      तिरोहे  मुझको मा सरस्वती
प्र्साद  के रूप में देती है मैं आगे  बांट देता हूँ

  हिंदी दिवस के दिन हिंदी 
               दुल्हन बनी इतराती है

हिंदी तू  भी अब  एक दिवसीय  मेहमान हो गई
हर साल हिंदी दिवस का त्यौहार मनाने आती है
अगले  साल फिर आऊंगी कहके चली जाती  है

अतिथि देवो भव की तर्ज़ पर , हिंदी तू भी हर बरस
सुबह  सबेरे भारत की मेहमान बनकर ही आती है
और ज़श्न मनाकर देर  रात गये तू चली भी जाती है

नये दौर के चाल चलन तूने भी हिंदी अब सीख  लिये
उस एक दिन में ही तू इतनी मोह्ब्बत बरसा जाती  है
अगले साल फिर आने का पक्का वायदा कर जाती है

एक दिन का मेहमान भी दिल को नहीं अखरता है
किसी का क्या लेती है आती है और चली जाती है
अपने हिस्से की ज़िंदगी एक ही दिन में जी जाती है

हिंदी दिवस की नई नवेली दुल्हन बन कर  हिंदी
सारा दिन ही  हिंदी  का मधु च्नद्र दिवस मनाती है
देर रात गये चले जाने की गुस्ताखी  कर जाती  है

अब हिंदी - हिंदी दिवस इस तरह ही मनाती है

         डोक्टर  सत्येंद्र गुप्ता
            मो   9837024900

Wednesday, May 15, 2019


तीन मिसरी शायरी कुछ नये 
              तिरोहे
    सदिया गुज़र गई कोइ तिरोहा
ही नहीं लिख् पाया - इधर मा सरस्व्ती 
की क्रिपा मुझ पर इतनी बरस रही है कि 
आज़कल मुझसे तीन मिसरी शायरी के अलावा
कुछ और  लिख ही नहीं पाता - कुछ तिरोहे पेश 
हैं
क़ाश इंसान  खुद  की क़ब्र खुद बना पाता
सोने  चांदी की दीवारोन से उसे सजा जाता
फिर सुक़ून से उससे वहान भी न रहा जाता

वो कहते हैं यह ज़िंदगी जिनकी बहुत हसीन है
जिनके हिस्से मे खुशिया ज़्यादा हैं गम  थोडा है
वह  क़्या कहे गम ने जिसको तोडा ही  तोडा है

देखना अपने दर्द को हिफाज़त से पालना
सुख तो मेहमान है  आयेगा चला जायेगा
दर्द ही है जो आखिर तक़ साथ निभायेगा

शराबे तमन्ना लिये बैठा रहा उनके क़रीब मैं
साक़ी ने पैमाना मुझे छोड उनको थमा दिया
मुझको आंखो में आंखे डाल के  बहला दिया

कहते हैं इस वक़्त का कुछ पता नहीं
यह क़िसी को भी वज़ीर बना सकता है
नज़ीर को पल में  फक़ीर बना सकता है

हम सच को रखते हैं तहो  में छिपाकर
हम डर की सिलवटो में छिपे  इंसान हैं
हम समाज़ के खौफ से डरे मेहमान हैं

       डा सतयेंद्र गुप्ता


Thursday, March 14, 2019

     

   तिरोहे तीन मिसरी शयरी
इश्क़ का अलग दस्तूर देखा
जिनको भूलाने में ज़माने लगे
मुझे देख वह मुस्कराने लगे
दिल से निकल गए थे जिनके
दिल में फिर वो घर बसाने लगे
हम दिल ही दिल शरमाने लगे
इश्क़ अदा है वफा है या दुआ
वो सबकी बिसात बिछाने लगे
हम भी खुद को समझाने लगे
कुछ सिफत थी उन आखों में
हम आईना उनको दिखाने लगे
और खुद से नजरें मिलाने लगे
देर आये दुरुस्त आये तो सही
हम भी दिल को समझाने लगे
संग साथ जिन्दगी बिताने लगे
मुकम्मिल है शायरी मेरी यह
तीन मिसरी शायरी बनाने लगे
तिरोहे ह्म्म गाकर सुनाने लगे
--- डॉ सत्येन्द्र गुप्ता

Monday, March 11, 2019





   एक कविता तिरोही
चुप रहती है जब तक़ बोतल मे बंद है
बाहर निकलते ही गज़ब बहुत ढ़ाती है
पैमाने में भरते भरते भी छ्लक जाती है
कितना खूबसूरत अंदाज़ है इसका भी
होठों को चूमने को बेताब हुई जाती है
महबूब बनकर गले से लिपटती जाती है
बहुत बवाल मचाती है यह शराब भी तो
जैसे जैसे गले से नीचे उतरती जाती है
रंगत अपनी असली दिखाती जाती है
आदमी को आदमी रहने नहीं देती वह
रह रह कर उसके सर पर चढ़ी जाती है
अच्छे आदमी को बना शराबी जाती है
------ डॉ सत्येन्द्र गुप्ता



     तिरोहे तीन मिसरी शायरी
कोई वायदा ना कोई क़रार लेकर आए
वो अपना कमसिन शबाब लेकर आए
पहली मुहब्बत का खवाब लेकर आए
कुछ दिखाया न कुछ छिपाया उन्होंने
हया का वो ऐसा नक़ाब लेकर आए
अदाओं की हसीन क़िताब लेकर आए
चेहरे पर भी नूर ए इश्क़ चमक रहा था
जैसे चौदहवीं का माहताब लेकर आए
दिल को भी अपने बेताब लेकर आए
सब्र का पैमाना छलक उठा मेरा भी तो
आखों से पीने की शराब लेकर आए
आंखों मे सुरूर बे हिसाब लेकर आए
अजब अंदाज़ था दिल की चोरी का भी
क़तरा क़तरा अपना हिसाब लेकर आए
मेरे मुहब्बत का भी सैलाब लेकर आए
------डॉ सत्येन्द्र गुप्ता




    तिरोहे तीन मिसरी शायरी
शहीद हुए पुलवामा में जो श्रद्धान्जली उन्हें देने को
वंदे मातरम की हमने अब अलख नई जगा दी है
आतंकवाद की होली भी पार सरहद ही जला दी है
नहीं खेलने देंगे किसी को भी मां तेरे सम्मान से हम
सरफिरे लोगो को हमने यह बात अब समझा दी है
मां तेरे सपूतों ने तेरी रक्षा करने की दिल
में ठानी है
न छीन सकेगा कोई मां तुझसे तेरे स्वाभिमान को
घर घर में जन्मे भगत सिंह रानी लक्ष्मीबाई है
नए अंदाज़ में मां तेरी जय जयकार हमें
सुनानी है
बरसों गुलामी सह हमने दौलत देश भक्ति
की कमाई थी
न लुटने देंगे इस सम्पदा को कसम सबने ये
खाई है
ये साहस धैर्य और देशभक्ति मां तुझ पर ही बलिहारि है
जंग लगे हथियारों पर हमने अब धार तेज़
लगवा दी है
नए अंदाज़ में वंदे मातरम की आवाज भी
सबको सुना दी है
आतंकवाद की होली हमने पार सरहद के जला दी है
----- डॉ सत्येन्द्र गुप्ता