नहीं आती जब तलक नहीं आती है
आने को किसी बात पर भी आती है।
हद से ज्यादा बे शरम होती है शर्म
आती है तो सबके सामने ही आती है।
कितनी ही कोशिशें कर के देख ली
कब्ज़े में जिंदगी कभी नहीं आती है।
बुढ़ापे में दम होता नहीं निकलता है
हर सांस उखड़ी उखड़ी सी ही आती है।
महक जिस गम की ताउम्र रहा करती है
आँख में कतराए शबनम बनी आती है।
उम्र रूह की नहीं जिस्म की हुआ करती है
ख़ामोशी भी तो बात करते ही आती है।
दिन तो जैसे तैसे कर गुज़र ही जाता है
कोई शाम बड़ी ही हसीन बनी आती है।
Monday, August 30, 2010
Sunday, August 29, 2010
हर बात की तलब अब छोड़ चुके हैं
हर बात की तलब हम अब छोड़ चुके हैं
अकड़ कर रहने का फ़न अब छोड़ चुके हैं।
शरीक अपने गम में हम अब किसे करें
तन्हा रहने का चलन हम छोड़ चुके हैं।
जो दरिया था वही समंदर बन गया
अश्क बहने का हुनर अब छोड़ चुके हैं।
मुहब्बत में रतजगा ही जरूरी काम था
गम के दहाने पर उसे अब छोड़ चुके हैं।
कुछ वक़्त लगता है भूलने में किसी को
रफ्ता रफ्ता शहर हम अब छोड़ चुके हैं।
मुहब्बत पुकारती है तन्हाई में अब भी
बस रुक कर सुनने का फ़न छोड़ चुके हैं।
परवाह दिल को उनकी आज भी उतनी है
वो नाम मेरा रेत पर लिख छोड़ चुके हैं।
अकड़ कर रहने का फ़न अब छोड़ चुके हैं।
शरीक अपने गम में हम अब किसे करें
तन्हा रहने का चलन हम छोड़ चुके हैं।
जो दरिया था वही समंदर बन गया
अश्क बहने का हुनर अब छोड़ चुके हैं।
मुहब्बत में रतजगा ही जरूरी काम था
गम के दहाने पर उसे अब छोड़ चुके हैं।
कुछ वक़्त लगता है भूलने में किसी को
रफ्ता रफ्ता शहर हम अब छोड़ चुके हैं।
मुहब्बत पुकारती है तन्हाई में अब भी
बस रुक कर सुनने का फ़न छोड़ चुके हैं।
परवाह दिल को उनकी आज भी उतनी है
वो नाम मेरा रेत पर लिख छोड़ चुके हैं।
Saturday, August 28, 2010
अलग आइनों में चेहरा अलग नज़र नहीं आता
अलग आइनों में चेहरा अलग नज़र नहीं आता
सूनी आँखों में अह्सासे गम नज़र नहीं आता।
अतीत की तहें पलटने से वर्तमान बदलेगा कैसे
बीमारी में कभी चेहरे पर नूर नज़र नहीं आता ।
गुमनामी के अँधेरे में खो कर रह गया था कभी
अपने वजूद में सिमटा वह अब नज़र नहीं आता।
खुद्दारी उसका जेवर बन कर के रहा करती थी
बुढ़ापे में भी मोहताज वह नज़र नहीं आता ।
अपने दर्दे- गम से लिखता है ग़ज़ल के मिसरे
चेहरे पर फिर भी कोई दर्द नज़र नहीं आता।
सूनी आँखों में अह्सासे गम नज़र नहीं आता।
अतीत की तहें पलटने से वर्तमान बदलेगा कैसे
बीमारी में कभी चेहरे पर नूर नज़र नहीं आता ।
गुमनामी के अँधेरे में खो कर रह गया था कभी
अपने वजूद में सिमटा वह अब नज़र नहीं आता।
खुद्दारी उसका जेवर बन कर के रहा करती थी
बुढ़ापे में भी मोहताज वह नज़र नहीं आता ।
अपने दर्दे- गम से लिखता है ग़ज़ल के मिसरे
चेहरे पर फिर भी कोई दर्द नज़र नहीं आता।
हर चेहरे की हंसी बेमानी लगती है .
हर चेहरे की हंसी बेमानी लगती है
माथे की शिकन परेशानी लगती है।
हर वक़्त जिंदगी में उलझन हैं इतनी
लाचारी एक नई कहानी लगती है।
अपने वजूद में सिमटे हुए हैं सब
रिश्तेदारी भी अब वीरानी लगती है।
रोटी जुटाने की फ़िक्र ओ कोशिश में
इंसान की खो गई जवानी लगती है।
अमीरी चमकती है गरीबी सिसकती है
दुनिया यूँ ही चलती रूमानी लगती है।
माथे की शिकन परेशानी लगती है।
हर वक़्त जिंदगी में उलझन हैं इतनी
लाचारी एक नई कहानी लगती है।
अपने वजूद में सिमटे हुए हैं सब
रिश्तेदारी भी अब वीरानी लगती है।
रोटी जुटाने की फ़िक्र ओ कोशिश में
इंसान की खो गई जवानी लगती है।
अमीरी चमकती है गरीबी सिसकती है
दुनिया यूँ ही चलती रूमानी लगती है।
वह तमाम घर में ख़ुशी बिखेर देती थी
वह तमाम घर में ख़ुशी बिखेर देती थी
नई तरतीब की हंसी बिखेर देती थी।
रेशमी भीगे बालों को लहरा कर के
नथुनों में महक सोंधी बिखेर देती थी।
सुबह सबेरे मेरी आँख नहीं खुलती थी
वह हंसके मुझ पे पानी बिखेर देती थी।
उसकी नर्म पलकों की ह्या सतरंगी
मेरे चेहरे पे चमक सी बिखेर देती थी।
कंधे से सरका कर के पल्लू होले से
मेरे वजूद में मस्ती बिखेर देती थी।
दिल में रूमानियत का ख्याल आने पर
नज़र में अपनी मर्ज़ी बिखेर देती थी।
इतरा कर चलती हुई छनछन करती
सहन में सारे मोती बिखेर देती थी।
नई तरतीब की हंसी बिखेर देती थी।
रेशमी भीगे बालों को लहरा कर के
नथुनों में महक सोंधी बिखेर देती थी।
सुबह सबेरे मेरी आँख नहीं खुलती थी
वह हंसके मुझ पे पानी बिखेर देती थी।
उसकी नर्म पलकों की ह्या सतरंगी
मेरे चेहरे पे चमक सी बिखेर देती थी।
कंधे से सरका कर के पल्लू होले से
मेरे वजूद में मस्ती बिखेर देती थी।
दिल में रूमानियत का ख्याल आने पर
नज़र में अपनी मर्ज़ी बिखेर देती थी।
इतरा कर चलती हुई छनछन करती
सहन में सारे मोती बिखेर देती थी।
Saturday, August 7, 2010
नियम तो बन गया लागू कैसे होगा .
नियम तो बन गया अब लागू कैसे होगा
बिगड़ा हुआ है जो वह साधू कैसे होगा ।
सोच कर यह भी तो परेशान हैं सब
जो सीधा है बहुत वह चालू कैसे होगा ।
उम्मीदों की जो बारात सजाये बैठे हैं
उनका बढ़ता गुस्सा काबू कैसे होगा ।
सन्नाटा चीख चीख कर परेशान है
लहरों का शोर आखिर काबू कैसे होगा ।
किताबों में ही पढ़ा है बच्चों ने अब तक
पता नहीं नाचता वह भालू कैसे होगा ।
संस्कारों में पला है जो शुरू से ही
बड़ा होकर वह चोर डाकू कैसे होगा ।
नसीहतें तो हर कोई दे देता है मगर
जीवन में सब कुछ लागू कैसे होगा ।
बिगड़ा हुआ है जो वह साधू कैसे होगा ।
सोच कर यह भी तो परेशान हैं सब
जो सीधा है बहुत वह चालू कैसे होगा ।
उम्मीदों की जो बारात सजाये बैठे हैं
उनका बढ़ता गुस्सा काबू कैसे होगा ।
सन्नाटा चीख चीख कर परेशान है
लहरों का शोर आखिर काबू कैसे होगा ।
किताबों में ही पढ़ा है बच्चों ने अब तक
पता नहीं नाचता वह भालू कैसे होगा ।
संस्कारों में पला है जो शुरू से ही
बड़ा होकर वह चोर डाकू कैसे होगा ।
नसीहतें तो हर कोई दे देता है मगर
जीवन में सब कुछ लागू कैसे होगा ।
काश हम सब हिन्दुस्तानी हो जाएँ .
जात पात की बातें सारी बेमानी हो जाएँ
दिल से हम सब काश !बलिदानी हो जाएँ ।
नाम के आगे धर्म लिखें न जात कोई अपनी
हिन्दुस्तानी लिखकर सब हिन्दुस्तानी हो जाएँ ।
जो भ्रष्ट हैं बेईमान हैं उनको सजा दिला दें
महल और झोंपड़ी के नाते बेमानी हो जाएँ ।
नारी को सम्मान मिला हो आँख में रहे न आंसू
दुर्बल न रहकर सब झाँसी की रानी हो जाएँ ।
दोबारा लिखें इतिहास परीक्षा फिर से देकर
स्वर्णिम हिंदुस्तान बनाकर सब ज्ञानी हो जाएँ ।
दिल से हम सब काश !बलिदानी हो जाएँ ।
नाम के आगे धर्म लिखें न जात कोई अपनी
हिन्दुस्तानी लिखकर सब हिन्दुस्तानी हो जाएँ ।
जो भ्रष्ट हैं बेईमान हैं उनको सजा दिला दें
महल और झोंपड़ी के नाते बेमानी हो जाएँ ।
नारी को सम्मान मिला हो आँख में रहे न आंसू
दुर्बल न रहकर सब झाँसी की रानी हो जाएँ ।
दोबारा लिखें इतिहास परीक्षा फिर से देकर
स्वर्णिम हिंदुस्तान बनाकर सब ज्ञानी हो जाएँ ।
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