Monday, January 15, 2018

खुशबू अच्छी थी अध खिले गुलाब की
कहानी इतनी सी है बस मेरे शबाब की
नींद उड़ जाती थी जब निगाहों से मेरी
तन्हाईयों  में जरुरत पड़ती थी  ख़्वाब की
ढूंढती है दुनिया जिसे इश्क के बाजार में
जरुरत नहीं मुझे वफ़ा की उस किताब की
रिवायतों का कत्ल हो गया था कल रात में
आवाज़ें आ रही थी कहीं से इन्कलाब की
रास्ता बदल लेते हैं वो मुझको देख कर
जरुरत पड़ने लगी है अब तो नकाब की
मेरे बयान में खुशबू है, रोशनी है दिल में
मैंने संभाल के रक्खी है परची हिसाब की
मैं भी किनारे लग गया था उस तूफान में
कहानी क्या बताऊँ तुम्हें उस सैलाब की
मुझको आता देख कर मैखाना भी बोला
तुम्हें भी लत लग गई यार अब शराब की
---------सत्येन्द्र गुप्ता

Sunday, January 7, 2018

वक़्त वह मौसम भी कितना सुहाना था
खुशियों ने बुना दिल का ताना बाना था
इश्क पर लिखी थी मैंने भी तो किताब
मेरी आशिकी का भी वो ही जमाना था
सारी मस्ती तेरी उन आँखों की ही थी
मेरे लिए तो जैसे वह ही मैखाना था
याद है अंगडाई लेने की वो अदा तेरी
तेरे पीछे आना तो वह इक बहाना था
जिसमें अपनी सूरत भी अजनबी लगे
तूने मुझे दिया घिसा आईना पुराना था
जिंदगी जाने क्या क्या रंग दिखाती है
लौट कर तूने भी तो वापस जाना था
सुना है आज वह जड़ से ही हिल गया
गिर गया शज़र ही वह जो पुराना था

Friday, December 15, 2017

गमे दिल से ही निजात न मिली
जैसी चाही थी हयात न मिली
इससे बड़ा दर्द और क्या होगा
हमें इश्क की सौग़ात न मिली
इक उम्र तक मनाता रहा उनको
क्या करते हमारी जात न मिली
मुद्दत से तलाश थी हमें जिसकी
किसी सिम्त आबे हयात न मिली
कुछ तो सुकून मिल जाता हमको
कयामत की ही कोई रात न मिली
मौत जब खड़ी हुई दर पर आकर
पल की भी मोहलते हयात न मिली
निजात - छुटकारा
हयात - जिंदगी , सिम्त - तरफ
आबे हयात - जीवन अमृत
नर्म लहजे में प्यार से बात न हुई
मुद्दत से कोई जवान रात न हुई
उम्र तो हमारी भी हो चली अब
मुहब्बत की कभी बरसात न हुई
बादलों में ही छिपा रहा रात भर
नए चाँद से कोई करामात न हुई
इतना मिलते थे हम भी जवानी से
बाद उससे कभी मुलाकात न हुई
अब हर बात मुश्किल सी लगती है
पहले तो इतनी मुश्किलात न हुई
जिंदगी ने भी इतना आजमाया हमें
कभी उनसेभी दिल की बात न हुई

Tuesday, December 5, 2017

यूं क्यों तुझसे हम दूर हुए 
तन्हाइयों  का दस्तूर  हुए।

बेबसी की हद इतनी  थी 
मिलने से भी मज़बूर हुए। 

कईं चाँद सूरज निकले थे 
हम  ही  मगर बे नूर  हुए।

पत्थरों के शहर में रहकर
हम ज़ख़्मों से भी चूर हुए।

बाद मरने के दुआ लगी थी  
तभी तो हम  मशहूर  हुए। 

मुझको मेरा खुदा न मिला 
नाहक ही हम मगरूर हुए। 

साक़ी तेरे मैखाने  में आज 
आकर हम भी मसरूर हुए।
        मसरूर - खुश 
        ------- सत्येंद्र गुप्ता  

Monday, December 4, 2017

वो शोख़ियां तबस्सुम वो कहकहे न रहे 
मिलने के भी अब तो   सिलसिले न रहे। 

मेरे ख़्याल की दुनिया में तुम मेरे पास थे 
हकीकत में तुम कभी  मेरे बनके न रहे। 

वह चीज़  जिसे हसरत से  देखते थे हम 
हुस्न  फरेब था वह , उसके जलवे न रहे। 

तुमने  जिन ग़मों से  नवाज़ा था  मुझको 
वह बेमिसाल गम भी तो अब मेरे न रहे। 

अज़ब है इस दुनिया  का भी चलन यारों 
ज़रूरत के वक़्त भी तुम कभी मेरे न रहे। 

मेरी उम्मीद मिट गई अगर मिटने भी दो 
वो होली, वो  दिवाली, वो  दशहरे  न रहे। 

मुझे खबर है  ज़िंदगी की आस तुम्ही हो  
अब अपने लख्ते  ज़िगर भी अपने न रहे। 

        -------- सत्येंद्र गुप्ता 
मोहब्बत की तासीर बदल गई 
चाहत  की तदबीर  बदल गई। 

उनको सजा  संवरा देखा जब 
हुस्न की भी  तस्वीर बदल गई। 

आतिशे रुख़्सार की वह सुर्ख़ी 
लगा मेरी भी तो हीर बदल गई। 

अंगड़ाई लेने की  अदा उनकी 
ख्वाहिशों की तहरीर बदल गई। 

रूबरू थी  वो आईने की तरह 
रूठी  हुई  तक़दीर  बदल गई। 

हर तरफ उनका ही चेहरा था 
क़यामत अपना तीर बदल गई 

             -----सत्येंद्र गुप्ता