Tuesday, September 3, 2013

कुछ दाग़ ज़िन्दगी भर नहीं जाते
उम्र गुज़र जाती है छिपाते छिपाते।
इश्क़ का सौदा कर लिया था कभी
कटी रातें सब कर्ज़ चुकाते चुकाते।
चरागों की बस्ती में बहुत ही  ढूँढा
सितारे छिप गये   दिखते दिखाते।
भटकती हैं परछाइयां अब आवारा 
बे सदा हो गईं गम सुनाते सुनाते।
जवानी  कब आई, चली गई  कब
थक गया आइना भी बताते बताते।
न जाने बादल यह घने कब छटेंगे
उम्मीद  टूटी आस लगाते लगाते।
परदेस से लौटकर आ तो गये तुम
ख़बर मिल गई हमें भी उड़ते उड़ाते।
 

Saturday, August 31, 2013

हर सवाल का ज़वाब मुहाल नहीं होता
सवाल का ज़वाब भी सवाल नहीं होता !
शिनाख्त कैसे करता दर्दे दिल की वह
हाल अपना ही कभी  बेहाल नहीं होता !
दिल सुर्ख़ लहू सुर्ख़ और ज़ख्म भी सुर्ख़
आँख से बहता आंसू ही लाल नहीं होता !
मैं अपना ज़वाल भी देख लेता होते हुए 
वक्त ने  किया अगर क़माल नहीं होता !
तन्हाइयां अगर मुझ में रंग नहीं भरती
उजाला कभी  घर में बहाल नहीं  होता !
मेरा चेहरा तक़सीम  हुआ नहीं दिखता
मेरे ही आईने में अगर बाल नहीं होता !
अब मुझ को रबत पड़ गया कुछ ऐसा
वो हंस भी देता है तो मलाल नहीं होता !
बुज़ुर्गों की दुआएं अगर साथ रख लेते
दिल यह जिगर कभी हलाल नहीं होता !

Monday, August 26, 2013

दिल बच्चा था शैतानी कर बैठा
किस्सा अपना जुबानी कर बैठा !
खुशबुओं को कौन चूम पाया है
खुशबु चूमने की नदानी कर बैठा !
सारे रंगों को घोल कर एक जगह
अपने रंगों को भी पानी कर बैठा !
दूधिया रात में  झील के किनारे
चांदनी को वो दिवानी कर बैठा !
जुल्फे सियह से लिपटा इस तरह
कि इश्क अपना तूफानी कर बैठा !
उजाले को ढूंढता फिरता रहता था
आसमान अपना नूरानी कर बैठा !

Saturday, August 24, 2013

हुस्न तो ढल गया ग़ुरूर अभी बाकी है
नशा भी उतर गया सरूर अभी बाकी है !
हवाओं ने छेड़खानी की और चली गई
फ़िज़ा में बिखरी गर्देसफ़र अभी बाकी है !
ढूंढते ढूंढते इश्क की नदी तक पहुँच गये
उसमे उतरने का ही हुनर अभी बाकी है !
तेरे बीमार को करार मिल सका न कहीं
उसका भटकना इधर उधर अभी बाकी है !
जो भो मिला बिछड़ने का सबब पूछता है
चेहरे पर जख्मों का नूर अभी बाकी है !
आँख से बहते आंसू थम न सके अब तक
सुनहरा है जख्म शबे हिज्र अभी बाकी है !
दिल को हमारे ही इश्क करना न आया
दिल में एक गम यह जरूर अभी बाकी है !

Wednesday, August 21, 2013

आख़िर कितनी और हम ख़ाक़ उड़ाते
कभी तो हवा के सुर में गीत मिलाते !
कोई खुशबु तो  हमारे अंदर  भी थी
क्या गज़ब करते अगर हम महक जाते !
ज़रा सी जिंदगी है बस चार दिन की
तमाशे इसमें और हम कितने दिखाते !
आंसुओं  के संग सब बह गया काज़ल
हिसाब दर्द का हम और कितना चुकाते !
वक्त अगर मोहलत हमको और दे देता
यक़ीनन हम भी कुछ क़माल कर जाते !

Friday, August 2, 2013

शहर तेरा यह बंज़र और नम निकलेगा
दिल पर यह जख्म भी रक़म निकलेगा !
यह ख़बर थी कि दम तो ज़रूर निकलेगा
ख़बर न थी इस क़दर यह दम निकलेगा !
नर्म लहजे से तुमने काम ले लिया अगर
उसूलों पर दिल मेरा भी क़ायम निकलेगा !
गलत लफ्ज़ अगर चुन लिया कहने  को
तो नक्शा   बदला हुआ हरदम निकलेगा  !
सर्दी की  कंपकपाती  हुई रात में भी तो
इन  आँखों  से आंसू तो गरम निकलेगा !
बैठे बैठे अँधेरी रात जब यह ढल  जायेगी
सुबह सूरज लेकर के नया दम निकलेगा !

Thursday, August 1, 2013

शुहरत छु लेती है जब भी ऊंचाइयां
आगे आगे चलती हैं तब परछाइयां !
मुझको काम में लगा हुआ  देखकर
मसरूफ़ होजाती हैं  मेरी तन्हाईयाँ !
खुशियों के रंग मुझ में जब भरते हैं
सिमट जाती हैं कहीं पे धुन्धलाइयां !
दिल की वादियों में शोर  मचता है
तो सुर्खियाँ बन जाती हैं  रानाइयां !
कुछ लोग मेरे उजालों से भी डरते हैं
परेशान करती हैं उनको अच्छाइयां !
ख़ुदकुशी कर लेते हैं  लोग बहुत से
और नापते ही रह जाते हैं गहराइयां !