हम तुम्हारे अगर नहीं होते
हम इतने पत्थर नहीं होते !
यही सोच के दिन कट रहे हैं
दर्द के दिन मुक़रर नहीं होते !
बिन माँ के बच्चे का दर्द ------
दिल में बहुत वीराना है
उलझन है ,सन्नाटा है !
मुसीबतें मेरा मुक़द्दर है
न बदला मेरा फ़साना है !
हर वक्त मुद्दा मै ही बना
मुश्किलों ने मुझे तलाशा है !
चुन चुन के दर्द मिले मुझे
जैसे दर्द ही मेरा ठिकाना है !
मर्ज़ की मेरे दवा न मिली
मेरा दर्द दुनिया से निराला है !
सुबह से घर में शोर मचा था
शाम को दावत में जाना है !
चलते हुए कह गये मुझ से
मुझे अपना खाना बनाना है !
तन्हा बैठ कर, रो रो कर
मैंने खाया एक निवाला है !
काश ! मेरा भी कोई होता
दर्द दिल में बेतहाशा है !
मेरे आंसू ही मेरा ज़ेवर है
नश्तरों ने इन्हें तराशा है !
पैदायशी पर भी सवाल उठे
माँ तुझ को यह बतलाना है !
सदियों ज़लालत सही मैंने
ज़िल्लतों ने मुझे नवाज़ा है !
ख़ुदकुशी भी मै कर न सका
दिल सोचता तो रोज़ाना है !
तू मुझे छोड़ के चली गई माँ
बस इतना मेरा अफ़साना है 1
Thursday, December 13, 2012
देखी राह तुम्हारी हमने
तन्हा रात गुज़ारी हमने !
पूरी रात टहल टहल कर
खुशबु पहनी तुम्हारी हमने !
दरवाज़े को तकते तकते
सारी रात गुज़ारी हमने !
ज़ुल्फ़ें यूं ही खुल गई थी
बिन शीशे के संवारी हमने !
पलकों में सजा रखी थी
एक तस्वीर न्यारी हमने !
नज़र उसकी दिल ही दिल में
कितनी बार उतारी हमने !
तुमको सोचा जब भी सोचा
जिंदगी सोच गुज़ारी हमने !
चाँद आया नहीं गोद में
देखी यह लाचारी हमने !
नींद ने आँख पे दस्तक न दी
लोरी बहुत पुकारी हमने !
पहरों करवट बदली हमने
ऐसे रात गुज़ारी हमने !
Saturday, December 8, 2012
उससे निगाह मिला सके, किसमे ताब थी
उसकी आँखों में चमक ही लाज़वाब थी !
उसकी महक ने ही रौंद दिया ज़िस्म को
पता नहीं कैसी वह जादुई शराब थी !
सुलगती थी रूह और तपता था बदन
वह तो मगर कोई ख्यालो ख़ाब थी !
जी पढने का करे तो देखते रह जाएं
वह तस्वीरों की ऐसी ही क़िताब थी !
फ़रिश्ते भी उसे देख कर के हैरान थे
वह महताब थी कि वह आफ़ताब थी !
Monday, December 3, 2012
ख़ुशी को किसी की नज़र लग गई
या ग़म को मेरी ही उम्र लग गई !
दिन दो चार मांगे थे जीने के लिए
मौत को पहले ही ख़बर लग गई !
बेहद उदास थे, रात में हम लोग
चश्म तर थी, फिर भी मगर लग गई !
यह पूछो वक्त से, शायद वो बताए
आग जो लगनी थी किधर लग गई !
दर्द छुपाकर रखा था, दिल में तेरा
इसकी भी दुनिया को ख़बर लग गई !
एकदम से चूम लिए होंठ, मैंने तेरे
मुझे भी शायद हवाए शहर लग गई !
Tuesday, November 27, 2012
दास्ताने - दर्द हम किसको सुनाते
पत्थरों के शहर में किसको बसाते !
आबे - हयात नहीं है पास में मेरे
दो घूँट पानी की किसको पिलाते !
शहर चले गये थे कमाने के वास्ते
लौट आये, शक्ल किसको दिखाते !
हवा बेवफ़ाई की ही बह रही थी
क़सम वफ़ा की किसको दिलाते !
अपने ख़त में तुमने लिखा था मुझे
महावर रचे पावों को चूम तो जाते !
क्या करें ख़ुद से ही परेशान थे हम
अपनी बेबसी क्या तुमको बताते !
Saturday, November 24, 2012
तुम उजालों के नाम हुए
हम अँधेरे में बेनाम हुए !
वफ़ा की रस्म निभाते रहे
और इश्क़ में नाकाम हुए !
अपने शहर में नेक नाम थे
तुम्हारे शहर में बदनाम हुए !
इतनी लुटाई दौलते -दिल
कि आख़िर में नीलाम हुए !
सहरा हूँ प्यास हं कौन हूँ मैं
ख़ुद की नज़र में बेदाम हुए !
हमें हमारे ही ग़म ने काटा
रफ़्ता रफ़्ता हम तमाम हुए !