Friday, May 25, 2012
कमाया बहुत मैंने लुटाया बहुत कुछ
ज़िन्दगी की दौड़ में ,खोया बहुत कुछ।
शिकस्त -ओ-तजुर्बे ,हर क़दम पर मिले
इस से मैंने ज़िन्दगी में ,पाया बहुत कुछ।
शाकिर हूँ तेरा, ऐ वक्त, मैं दिलो जान से
तूने मुझे ज़िन्दगी में दिलाया बहुत कुछ।
कोई भी किस्सा ज़िन्दगी का ज़ाया न गया
ऐ ज़िन्दगी,तूने मुझे सिखाया बहुत कुछ।
ऐ दोस्त ,तुम्हारा भी शुक्रगुज़ार हूँ बहुत
जैसा भी हूँ ,मैं तुमने निभाया बहुत कुछ।
Thursday, May 24, 2012
ज़िन्दगी और ख़ूबसूरत हो गई
उन से मिलने की सूरत हो गई।
मुझे सुर्खरू कर गई एक खबर
सहर को मेरी ज़रूरत हो गई।
हर पल हो गया मेरे लिए ख़ास
वक्त की बड़ी अहमियत हो गई।
लम्हा कोई अब तंग नहीं करता
दिल को कितनी फ़ुरसत हो गई।
एक हसीन इत्तेफ़ाक ये भी हुआ
मुहब्बत सिला-ए-इबादत हो गई।
एक बीमार फिर ख़ुशनुमा हो गया
कितनी खुशख्याल हरक़त हो गई।
उन से मिलने की सूरत हो गई।
मुझे सुर्खरू कर गई एक खबर
सहर को मेरी ज़रूरत हो गई।
हर पल हो गया मेरे लिए ख़ास
वक्त की बड़ी अहमियत हो गई।
लम्हा कोई अब तंग नहीं करता
दिल को कितनी फ़ुरसत हो गई।
एक हसीन इत्तेफ़ाक ये भी हुआ
मुहब्बत सिला-ए-इबादत हो गई।
एक बीमार फिर ख़ुशनुमा हो गया
कितनी खुशख्याल हरक़त हो गई।
Wednesday, May 23, 2012
रिश्तों की जो हम कहीं बुनियाद डाल देते
हसरतें दिल की अपनी सारी निकाल देते।
महक उठती मिटटी आँगन की हमारे भी
प्यार की ख़ुशबू का अगर बीज डाल देते।
वक्त थोड़ी सी भी अगर मोहलत दे देता
निख़ार हम भी अपने ख़्वाबो-ख़्याल देते।
एक भी लफ्ज़ प्यार का जो हम बोल देते
सब हमारे उस लहज़े की ही मिसाल देते।
एहसास के आईने पर कभी गर्द न जमती
बिन पिए ज़ाम अपना जो हम उछाल देते।
तन्हाइयां जब भी हमे तड़पाने को होती
अपनों की हम भी फेरहिस्त निकाल देते।
चाँद भी हमारी चाहतों का कायल हो जाता
चांदनी के गले अगर अपनी बाँहे डाल देते।
हसरतें दिल की अपनी सारी निकाल देते।
महक उठती मिटटी आँगन की हमारे भी
प्यार की ख़ुशबू का अगर बीज डाल देते।
वक्त थोड़ी सी भी अगर मोहलत दे देता
निख़ार हम भी अपने ख़्वाबो-ख़्याल देते।
एक भी लफ्ज़ प्यार का जो हम बोल देते
सब हमारे उस लहज़े की ही मिसाल देते।
एहसास के आईने पर कभी गर्द न जमती
बिन पिए ज़ाम अपना जो हम उछाल देते।
तन्हाइयां जब भी हमे तड़पाने को होती
अपनों की हम भी फेरहिस्त निकाल देते।
चाँद भी हमारी चाहतों का कायल हो जाता
चांदनी के गले अगर अपनी बाँहे डाल देते।
Thursday, May 17, 2012
जिंदगी को बहुत ढूँढा ,ज़िंदगी नहीं मिली
दिल के लायक कहीं भी ख़ुशी नहीं मिली।
दरारें पड़ गई थी नई दीवारों में घर की
उनसे झांकती मगर रौशनी नहीं मिली।
बन्दों के हुजूम में ही घिरा रहा मैं अक्सर
बेरूखी तो मिली कहीं बन्दगी नहीं मिली।
दामन बेदाग़ रहा जिसका मैला न हुआ हो
ऐसी कभी भी कोई मुझे हस्ती नहीं मिली।
आसान नहीं था तूफाँ- ए- दरिया का सफ़र
वो तो हौसलों को दोपहर तपती नहीं मिली।
मंजिल को तलाशते तो सब ही मिले मगर
मंजिल किसी को भी तलाशती नहीं मिली।
दिल के लायक कहीं भी ख़ुशी नहीं मिली।
दरारें पड़ गई थी नई दीवारों में घर की
उनसे झांकती मगर रौशनी नहीं मिली।
बन्दों के हुजूम में ही घिरा रहा मैं अक्सर
बेरूखी तो मिली कहीं बन्दगी नहीं मिली।
दामन बेदाग़ रहा जिसका मैला न हुआ हो
ऐसी कभी भी कोई मुझे हस्ती नहीं मिली।
आसान नहीं था तूफाँ- ए- दरिया का सफ़र
वो तो हौसलों को दोपहर तपती नहीं मिली।
मंजिल को तलाशते तो सब ही मिले मगर
मंजिल किसी को भी तलाशती नहीं मिली।
Wednesday, May 16, 2012
क्यों कहा तुमने ,कि तुम शहर में नहीं
इसका जो असर हुआ, वो ज़हर में नहीं।
मान लिया मुलाक़ात के बाद ,यह मैंने
शबे-फिराक़ सा क़हर किसी क़हर में नहीं।
अपनी ही गहराइयों से अनजान रहा मैं
मुझ में जो गहराई है , समन्दर में नहीं।
दिल के रोग में ही गुज़र गई उम्र सारी
इतना सुकून किसी भी रहगुज़र में नहीं।
वो फूल की ख़ुशबू है कि घटा सावन की
इसका ज़िक्र सहरा की ख़बर में नहीं।
चेहरे की असलियत से करा दे रु-ब-रु
ऐसा कोई आइना अब तक नज़र में नहीं।
इसका जो असर हुआ, वो ज़हर में नहीं।
मान लिया मुलाक़ात के बाद ,यह मैंने
शबे-फिराक़ सा क़हर किसी क़हर में नहीं।
अपनी ही गहराइयों से अनजान रहा मैं
मुझ में जो गहराई है , समन्दर में नहीं।
दिल के रोग में ही गुज़र गई उम्र सारी
इतना सुकून किसी भी रहगुज़र में नहीं।
वो फूल की ख़ुशबू है कि घटा सावन की
इसका ज़िक्र सहरा की ख़बर में नहीं।
चेहरे की असलियत से करा दे रु-ब-रु
ऐसा कोई आइना अब तक नज़र में नहीं।
Saturday, May 12, 2012
ज़िन्दगी को क़रीब से देखने की ज़रूरत है
ख़ुद को ख़ुद से ही सीखने की ज़रूरत है।
इन्सान की फ़ितरत है, संतुष्ट नही होता
हमें अपनी आदत बदलने की ज़रूरत है।
ख़ुद की हर चीज़ में कमी नज़र आती है
हमे ख़ुद से ही ज़ंग करने की ज़रूरत है।
दूसरों से तुलना हमे नेगेटिव बना देती है
हमे ख़ुद पर विश्वास करने की ज़रूरत है।
आज दिन मैंने ख़ास किया, क्या सीखा
रात में ख़ुद से सवाल पूछने की ज़रूरत है।
आज दिन ढुलमुल नहीं जोश से भरा होगा
हर सुबह नया संकल्प भरने की ज़रूरत है।
ख़ुद को ख़ुद से ही सीखने की ज़रूरत है।
इन्सान की फ़ितरत है, संतुष्ट नही होता
हमें अपनी आदत बदलने की ज़रूरत है।
ख़ुद की हर चीज़ में कमी नज़र आती है
हमे ख़ुद से ही ज़ंग करने की ज़रूरत है।
दूसरों से तुलना हमे नेगेटिव बना देती है
हमे ख़ुद पर विश्वास करने की ज़रूरत है।
आज दिन मैंने ख़ास किया, क्या सीखा
रात में ख़ुद से सवाल पूछने की ज़रूरत है।
आज दिन ढुलमुल नहीं जोश से भरा होगा
हर सुबह नया संकल्प भरने की ज़रूरत है।
Friday, May 11, 2012
खुद की तलाश में हूँ,राहगीर नहीं हूँ
अल्लाह का करम है,शमशीर नहीं हूँ।
इक नई सुबह का आगाज़ तो हूँ मैं
अँधेरी रात का मगर मैं तीर नहीं हूँ।
दिल ने ठानी है चुप रहने की वह तो
खामोश हूँ ,दिल का फ़कीर नहीं हूँ।
बेवज़ह उदासी जो दिल को दिला दे
मैं इतनी भी बुरी तस्वीर नहीं हूँ।
मिलना,बिछुड़ना और फिर तडफ़ना
बेचैन हूँ,गम की कोई तश्हीर नहीं हूँ।
बात कही है तो निभाऊंगा भी ज़रूर
कमी में हूँ मगर मैं तस्खीर नहीं हूँ।
तश्हीर-विज्ञापन तस्खीर-हारा हुआ
अल्लाह का करम है,शमशीर नहीं हूँ।
इक नई सुबह का आगाज़ तो हूँ मैं
अँधेरी रात का मगर मैं तीर नहीं हूँ।
दिल ने ठानी है चुप रहने की वह तो
खामोश हूँ ,दिल का फ़कीर नहीं हूँ।
बेवज़ह उदासी जो दिल को दिला दे
मैं इतनी भी बुरी तस्वीर नहीं हूँ।
मिलना,बिछुड़ना और फिर तडफ़ना
बेचैन हूँ,गम की कोई तश्हीर नहीं हूँ।
बात कही है तो निभाऊंगा भी ज़रूर
कमी में हूँ मगर मैं तस्खीर नहीं हूँ।
तश्हीर-विज्ञापन तस्खीर-हारा हुआ
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