माँ ही सब से अलहदा होती है
हर वक्त प्यार का लम्हा होती है।
दिल के काफी क़रीब होती है
प्यार का समन्दर गहरा होती है।
धूप में सुहानी छाँव होती है
दिखलाती वह सही दिशा होती है।
सबसे पहले दिल देते हैं जिसे
प्यार हमारा वह पहला होती है।
माँ की दुआ से काम संवरते हैं
माँ खुशियों का झरना होती है।
अपनी आँखों से दुनिया दिखाती है
माँ हमारी सारी दुनिया होती है।
जिससे सुंदर कोई और नहीं होता
वह हमारी रानी माँ ही होती है।
Thursday, May 10, 2012
Wednesday, May 9, 2012
मेरे घर का अगर तुम एक फ़ेरा ही ड़ाल देते
पलकों से तुम्हारे पाँव के हम ख़ार निकाल देते।
किसी मक़सद से फ़ासला ए दिल जो मिटा देते
दरमियाँ नए रिश्तों की हम बुनियाद ड़ाल देते।
बर्फ सा ज़म गया है खून ज़िस्म का हमारे
अफशां-ए- ताब से तुम्हारे हम उसे उबाल देते।
दिल के बहाव में अगर तुम डूबने को होते
क़सम ख़ुदा की हाथ थाम कर सम्भाल देते।
हमारी बंदगी दुनिया ए मिसाल बन जाती
हसरत दोनों दिलों की ही हम निकाल देते।
पलकों से तुम्हारे पाँव के हम ख़ार निकाल देते।
किसी मक़सद से फ़ासला ए दिल जो मिटा देते
दरमियाँ नए रिश्तों की हम बुनियाद ड़ाल देते।
बर्फ सा ज़म गया है खून ज़िस्म का हमारे
अफशां-ए- ताब से तुम्हारे हम उसे उबाल देते।
दिल के बहाव में अगर तुम डूबने को होते
क़सम ख़ुदा की हाथ थाम कर सम्भाल देते।
हमारी बंदगी दुनिया ए मिसाल बन जाती
हसरत दोनों दिलों की ही हम निकाल देते।
रख्ते सफ़र लेकर चलना मुश्किल हो गया
बड़े लोगों की बस्ती में अब वो दाखिल हो गया।
कच्ची उम्र में सपने उस ने देख लिए इतने
अमीरों की हस्ती में दिल शामिल हो गया।
दिल इस तरह से दीवाना उन का हुआ फिर
उनका पऊंचा थाम लबे-साहिल हो गया।
रफ़्ता रफ़्ता रुख़ हवा का भी बदल गया
बड़े घर में रहने के वह काबिल हो गया।
इतर रहा है पहुँच कर शुहरत की उंचाई पे
दिल को नया मुकाम एक हासिल हो गया।
बड़े लोगों की बस्ती में अब वो दाखिल हो गया।
कच्ची उम्र में सपने उस ने देख लिए इतने
अमीरों की हस्ती में दिल शामिल हो गया।
दिल इस तरह से दीवाना उन का हुआ फिर
उनका पऊंचा थाम लबे-साहिल हो गया।
रफ़्ता रफ़्ता रुख़ हवा का भी बदल गया
बड़े घर में रहने के वह काबिल हो गया।
इतर रहा है पहुँच कर शुहरत की उंचाई पे
दिल को नया मुकाम एक हासिल हो गया।
Tuesday, May 8, 2012
कुछ लोग जोड़ घटाने में लगे रहे
रिश्तों को अपने भुनाने में लगे रहे।
हमें रिश्तों की अहमियत पता थी
हम रिश्तों को निभाने में लगे रहे।
ज़िन्दगी की फ़ेरहिस्त न-तमाम थी
वह कमियों को गिनाने में लगे रहे।
धूप और छाँव का सफ़र है ज़िन्दगी
हम पेंच ओ ख़म सुलझाने में लगे रहे।
कांटे को भी चूम लिया हमने देख कर
हम अपनी खुदाई लुटाने में लगे रहे।
ग़ुरबत में भी ऊँची रही नजरें हमारी
फ़ाक़ा मस्ती से दिल लगाने में लगे रहे।
रिश्तों को अपने भुनाने में लगे रहे।
हमें रिश्तों की अहमियत पता थी
हम रिश्तों को निभाने में लगे रहे।
ज़िन्दगी की फ़ेरहिस्त न-तमाम थी
वह कमियों को गिनाने में लगे रहे।
धूप और छाँव का सफ़र है ज़िन्दगी
हम पेंच ओ ख़म सुलझाने में लगे रहे।
कांटे को भी चूम लिया हमने देख कर
हम अपनी खुदाई लुटाने में लगे रहे।
ग़ुरबत में भी ऊँची रही नजरें हमारी
फ़ाक़ा मस्ती से दिल लगाने में लगे रहे।
Saturday, May 5, 2012
ऐसा लगा दिल तुमसे, फिर कहीं और न लगा
घर में,किसी महफ़िल में, किसी ठौर न लगा।
मिलनसार,खुश सोहबत ,शादबाश होकर भी
दिल तन्हाई में तो लगा,फिर कहीं और न लगा।
तुमको तो मिलते रहे ,चाहने वाले हर क़दम
हमारे हाथ मुहब्बत का फिर वो दौर न लगा।
अपना अफ़साना ख़ुद की तरफ मोड़ दिया मैंने
तुमसे मिलने का जब कोई फिर तौर न लगा।
मेरे ज़हान में ख़ुदा बन्दों में ही तो बसता है
यह समझने में मुझे वक्त फिर और न लगा।
घर में,किसी महफ़िल में, किसी ठौर न लगा।
मिलनसार,खुश सोहबत ,शादबाश होकर भी
दिल तन्हाई में तो लगा,फिर कहीं और न लगा।
तुमको तो मिलते रहे ,चाहने वाले हर क़दम
हमारे हाथ मुहब्बत का फिर वो दौर न लगा।
अपना अफ़साना ख़ुद की तरफ मोड़ दिया मैंने
तुमसे मिलने का जब कोई फिर तौर न लगा।
मेरे ज़हान में ख़ुदा बन्दों में ही तो बसता है
यह समझने में मुझे वक्त फिर और न लगा।
Thursday, May 3, 2012
वक्त ही था जो मुझे बाख़बर कर गया
तश्नगी से मगर तर ब तर कर गया।
ज़िस्म का शहर तो वही रहा मगर
दिल को मेरे रख्ते-सफ़र कर गया।
मैंने जिस के लिए घरबार छोड़ा था
अपने घर से मुझे वो बेघर कर गया।
फ़िराक में गुज़र रही थी ज़िन्दगी मेरी
मेरे हाल की सबको खबर कर गया।
गमों से मेरे ताल्लुकात बना कर
हर शब को मेरी बे-सहर कर गया।
माना तस्सवुर तेरा मेहरबान रहा
पर दुआ को मेरी बे-असर कर गया।
तश्नगी से मगर तर ब तर कर गया।
ज़िस्म का शहर तो वही रहा मगर
दिल को मेरे रख्ते-सफ़र कर गया।
मैंने जिस के लिए घरबार छोड़ा था
अपने घर से मुझे वो बेघर कर गया।
फ़िराक में गुज़र रही थी ज़िन्दगी मेरी
मेरे हाल की सबको खबर कर गया।
गमों से मेरे ताल्लुकात बना कर
हर शब को मेरी बे-सहर कर गया।
माना तस्सवुर तेरा मेहरबान रहा
पर दुआ को मेरी बे-असर कर गया।
शराब का रंग किस क़दर सब्ज़-ओ- ज़र्द है
छिपाए ज़िगर में जैसे कोई गहरा दर्द है।
बांहे फैलाए फिर भी बुलाती है सबको वो
लगता है ,हर दिल की बड़ी ही वो हमदर्द है।
आसाँ नहीं है दुनिया-ए मुहब्बत का सफ़र
आलम बड़ा ही बेज़ान और पुर-ज़र्द है।
मुहब्बत कुदरत है ,अहद-ए-वफ़ा नहीं
जिसे पाने की कोशिश में हर एक फ़र्द है।
चलाकर तीर मुसलसल पूछते हो क्यों
बताओ तो सही होता तुम्हे कहाँ दर्द है।
बन्दगी की अब कहीं मिसाल नहीं मिलती
यही सोचकर परेशान अब अक्लो-खिर्द है।
ज़र्द- पीला पुर-ज़र्द -- बेज़ान
अहद-ए-वफ़ा ---वफ़ा का वचन
अक्लो-खिर्द---बुद्धि
छिपाए ज़िगर में जैसे कोई गहरा दर्द है।
बांहे फैलाए फिर भी बुलाती है सबको वो
लगता है ,हर दिल की बड़ी ही वो हमदर्द है।
आसाँ नहीं है दुनिया-ए मुहब्बत का सफ़र
आलम बड़ा ही बेज़ान और पुर-ज़र्द है।
मुहब्बत कुदरत है ,अहद-ए-वफ़ा नहीं
जिसे पाने की कोशिश में हर एक फ़र्द है।
चलाकर तीर मुसलसल पूछते हो क्यों
बताओ तो सही होता तुम्हे कहाँ दर्द है।
बन्दगी की अब कहीं मिसाल नहीं मिलती
यही सोचकर परेशान अब अक्लो-खिर्द है।
ज़र्द- पीला पुर-ज़र्द -- बेज़ान
अहद-ए-वफ़ा ---वफ़ा का वचन
अक्लो-खिर्द---बुद्धि
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