Sunday, October 16, 2011

अब चिट्ठी पत्री मिले जमाने गुज़र गए
तुम्हे गाँव में आये जमाने गुज़र गये।
दूधिया रातों में सूनी छत पर बैठ कर
वो रूह छू लेने के जमाने गुज़र गये।
तालाब के किनारे की लम्बी गुफ्तगू
कुछ कहने सुनने के जमाने गुज़र गये।
किसकी नज़र लगी जाने मेरी उम्र को
वो आइना देखने के जमाने गुज़र गये।
आजाओ मेरी रुखसती बेहद करीब है
कहोगे वरना ,मिले जमाने गुज़र गये।

Friday, October 14, 2011

जो है उस से अब बेहतर चाहिए
दरिया सूख गया समंदर चाहिए।
इन रस्तों पर चलते उम्र गुजर गई
सफ़र को अब नई रहगुज़र चाहिए।
जो हुआ सो हुआ अब उसे भूल जा
अब दिल प्यार से तर-ब-तर चाहिए।
जिंदगी को तस्वीर बना कर रख दे
मुझे एक नया मुसव्विर चाहिए।
खिदमत माँ बाप की अच्छी नहीं लगती
उन्हें रहने के लिए अलग घर चाहिए।
हंसने पर कोई भी पाबंदी न हो जहाँ
ख्वाहिशों में भीगा वह शहर चाहिए।

मुसव्विर-कलाकार

Thursday, October 13, 2011

कुछ हौसला तो दिखाना होगा
पुरानी रवायतों को भुलाना होगा।
सिकुड़ती जा रही हैं सरहदें भी
खुद को तो अब बचाना होगा।
यह दुनिया तो तडपाएगी सदा
पर दिल कहीं तो लगाना होगा।
ज़र्रा छू सकता है आसमान को
सबको यह भी तो दिखाना होगा।
सूरज बनकर चमक गया अगर
फिर कदमों पे तेरे जमाना होगा।

Wednesday, October 12, 2011

जाने कैसे पीछे वह छुट गया था
इतनी सी बात पर बस रूठ गया था।
छेड़ना उसको बड़ी ही एहितयात से
उस साज़ का कोई तार टूट गया था।
कर्ज़ हवाओं का मैं हर रोज़ लेता हूँ
वर्ना जिस्म तो कबका छुट गया था।
तेरा कहना सही है मैं कुछ नहीं कहता
लफ्जों का खज़ाना मेरा लुट गया था।
चिकना हो गया था पानी की चोट से
इस पत्थर में दर्द ऐसे कुट गया था।
मेरा जनून मुबारक देता है मुझको
दम तो बचपन में ही घुट गया था।

Saturday, October 8, 2011

फूल कभी जख्मे-सर कर नहीं सकता
नन्हा कतरा समन्दर भर नहीं सकता।
जिगर तेरा आसमान से भी बड़ा है
बराबरी मैं उसकी कर नहीं सकता।
गलियाँ मेरे गाँव की बहुत ही तंग हैं
तेरा ख्याल उनमे ठहर नहीं सकता।
मेरा दर्द तो मेरा हासिले-हस्ती है
मेरी हद से कभी गुज़र नहीं सकता।
नशा इस दिल से तेरे फ़िराक का
इस जन्म में तो उतर नहीं सकता।
सुदामा दिली दोस्त रहा था उसका
इस बात से कृष्ण मुकर नहीं सकता।

हासिले-हस्ती --जीवन की उपलब्धि

Tuesday, October 4, 2011

झूठी शान दिखाने से क्या फायदा
दिन में दिए जलाने से क्या फायदा।
बदसूरत हो गया है अब चेहरा बहुत
नया शीशा मंगाने से क्या फायदा।
उम्र भर याद किया है इतना उन्हें
अब नज़रें चुराने से क्या फायदा।
हमारे किस्से भी लोग सुनायेंगे ही
ग़लत बातें बनाने से क्या फायदा।
बात पुरानी है एहसास तो जिंदा है
फिर रिश्ते निभाने से क्या फायदा।

बैठकर के जो सुन सके उसे ही सुना
हर किसी को सुनाने से क्या फायदा।
दुनिया वाले तुझको भला देंगे भी क्या
जख्म सबको दिखाने से क्या फायदा।

दीवानगी की भी कोई तो हद होगी
खुद को पागल बनाने से क्या फायदा।



Saturday, October 1, 2011

कुदरत का कमाल था कोई
या हुस्न बेमिसाल था कोई।
देखकर के निगाहें हैरान थी
हर दिल में सवाल था कोई।
उसकी उम्दा कारीगरी पर
शिद्दत से निहाल था कोई।
जो देखनहीं सका वो मंज़र
उस दिल में मलाल था कोई।