फैसला रुका हुआ मिल जाता तो अच्छा था
सिलसिला कोई बन जाता तो अच्छा था।
ख़ुशी से मिलता या मिलता गम से ही
करार दिल को मिल जाता तो अच्छा था।
घुट घुट के जीना भी कोई जीना है भला
गुबार दिल का निकल जाता तो अच्छा था।
है तुझ में भी है मुझ में भी अहम् भरा हुआ
घमंड दिल से निकल जाता तो अच्छा था।
नाम के साथ परेशानियाँ भी बढ़ गई मेरी
मैं अजनबी सा बन जाता तो अच्छा था।
Monday, September 27, 2010
Saturday, September 18, 2010
लकीर तेरी लकीर से मेरी बड़ी हो गयी
लकीर तेरी लकीर से मेरी बड़ी हो गयी
लकीरे ही अब अना आदमी की हो गयी।
कुछ और किसी को भी अब सूझता नहीं
कमी आदमी की बड़ी एक यही हो गयी।
माफिक नहीं हैं हालात जल्द बदल जायेंगे
तकदीर कहाँ खराब फिर अपनी हो गयी।
जीतना किसी न किसी को तो था जरूर
गम क्यों शिकस्त आज अपनी हो गयी।
होसला दिल में है अगर जिंदा उमंग है
जमाना देखेगा कल ख़ुशी अपनी हो गयी।
लकीरे ही अब अना आदमी की हो गयी।
कुछ और किसी को भी अब सूझता नहीं
कमी आदमी की बड़ी एक यही हो गयी।
माफिक नहीं हैं हालात जल्द बदल जायेंगे
तकदीर कहाँ खराब फिर अपनी हो गयी।
जीतना किसी न किसी को तो था जरूर
गम क्यों शिकस्त आज अपनी हो गयी।
होसला दिल में है अगर जिंदा उमंग है
जमाना देखेगा कल ख़ुशी अपनी हो गयी।
कब तक यूं ही बर्बाद होते रहेंगे
कब तक हम यूँ ही बर्बाद होते रहेंगे
दिल में रह रह के मलाल होते रहेंगे।
न सूखेगा समंदर का पानीतो कभी
दरियाही बस सारे ख़ाक होते रहेंगे।
शोर तनहाइयों पर हँसता ही रहेगा
बिछुड़े रिश्तों के मलाल होते रहेंगे।
जख्मो से महक तो उडती ही रहेगी
हादसे भी सुबह और शाम होते रहेंगे।
सहमा सा पेड़ खड़ा क्या देख रहा है
सदा ऐसे भी ही सवाल होते रहेंगे।
दिल में रह रह के मलाल होते रहेंगे।
न सूखेगा समंदर का पानीतो कभी
दरियाही बस सारे ख़ाक होते रहेंगे।
शोर तनहाइयों पर हँसता ही रहेगा
बिछुड़े रिश्तों के मलाल होते रहेंगे।
जख्मो से महक तो उडती ही रहेगी
हादसे भी सुबह और शाम होते रहेंगे।
सहमा सा पेड़ खड़ा क्या देख रहा है
सदा ऐसे भी ही सवाल होते रहेंगे।
बातों में हमको न उलझाओ यारो
बातों में ही हमको न उलझाओ यारो
अपने दिल की भी कुछ सुनाओ यारो।
तलब पूरी नहीं होती है दिल की कभी
कितने ही जाम ओठों से लगाओ यारो।
तमाशा बन गया तो फिर मुश्किल होगी
सुलगी चिंगारीको राख में न दबाओ यारो।
कहा था उसने कि सूराख हो जायेगा
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।
मैं कहता हूँ वजूद ही छलनी हो गया
पत्थर शब्दों के और न उछालो यारो।
बहुत बदनाम हो चुका हूँ मैं जहान में
अब और पगड़ी न हमारी उछालो यारो।
अपने दिल की भी कुछ सुनाओ यारो।
तलब पूरी नहीं होती है दिल की कभी
कितने ही जाम ओठों से लगाओ यारो।
तमाशा बन गया तो फिर मुश्किल होगी
सुलगी चिंगारीको राख में न दबाओ यारो।
कहा था उसने कि सूराख हो जायेगा
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।
मैं कहता हूँ वजूद ही छलनी हो गया
पत्थर शब्दों के और न उछालो यारो।
बहुत बदनाम हो चुका हूँ मैं जहान में
अब और पगड़ी न हमारी उछालो यारो।
Wednesday, September 15, 2010
सूखी शाख पर हरे पत्ते नहीं मिलते
सूखी शाख पर हरे पत्ते नहीं मिलते
टुटा दिल बहलने के रस्ते नहीं मिलते।
वह जिनसे रूह को ठंडक मिलती थी
दिल में पलते वह रिश्ते नहीं मिलते।
नकली फूलों का चलन इतना बढ़ गया
असली फूलों के गुलदस्ते नहीं मिलते।
खुशियाँ सिमटके रह गई चंद पलों में
इन्सान हर वक़्त हँसते नहीं मिलते।
गुजरना न इस डगर से काफिले लेकर
इस सरहद से आगे रस्ते नहीं मिलते।
टुटा दिल बहलने के रस्ते नहीं मिलते।
वह जिनसे रूह को ठंडक मिलती थी
दिल में पलते वह रिश्ते नहीं मिलते।
नकली फूलों का चलन इतना बढ़ गया
असली फूलों के गुलदस्ते नहीं मिलते।
खुशियाँ सिमटके रह गई चंद पलों में
इन्सान हर वक़्त हँसते नहीं मिलते।
गुजरना न इस डगर से काफिले लेकर
इस सरहद से आगे रस्ते नहीं मिलते।
Tuesday, September 14, 2010
हिंदी की सम्पदा सिमटती जा रही है .
हिंदी की सम्पदा सिमटती जा रही है
हिंदी पल पल सिसकती जा रही है।
प्रयोग करने को शब्द नहीं मिलते
हर दिल से हिंदी हटती जा रही है।
अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ती नई पीढी
हिंदी से बहुत ही दूर हुई जा रही है।
हिंदी में सहजता से बोल नहीं पाते
परम्परा हिंदी की टूटती जा रही है।
व्यवहार में आने वाले शब्द भूल गएहैं
अंग्रेजी शब्दों से भरपाई की जा रही है।
कितनी ही कोशिशे कर के देख ली
दशा हिंदी की बिगडती ही जा रही है।
हर वर्ष हिंदी दिवस मनाकर ही बस
बरसी की रस्म अदायगी की जा रही है।
हिंदी पल पल सिसकती जा रही है।
प्रयोग करने को शब्द नहीं मिलते
हर दिल से हिंदी हटती जा रही है।
अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ती नई पीढी
हिंदी से बहुत ही दूर हुई जा रही है।
हिंदी में सहजता से बोल नहीं पाते
परम्परा हिंदी की टूटती जा रही है।
व्यवहार में आने वाले शब्द भूल गएहैं
अंग्रेजी शब्दों से भरपाई की जा रही है।
कितनी ही कोशिशे कर के देख ली
दशा हिंदी की बिगडती ही जा रही है।
हर वर्ष हिंदी दिवस मनाकर ही बस
बरसी की रस्म अदायगी की जा रही है।
Monday, September 13, 2010
हिंदी दिवस पर विशेष एक कविता
ज्यों माथे का अभिमान है बिंदी
हर अधर की भी शान है हिंदी।
मेरी भी है तेरी भी है सबकी है
प्यार भरी मुस्कान है हिंदी।
जन जन के हृदय की झंकार है
साहित्य का गौरव गान है हिंदी।
ज्ञान प्रकाश चहुँ और फैलाती
सब भाषाओँ में महान है हिंदी।
मानवता का पाठ पढ़ाती है यह।
सकल गुणों की खान है हिंदी।
जन मानस में खुशहाली भरती
माँ भारत की प्रिय संतान है हिंदी।
हर अधर की भी शान है हिंदी।
मेरी भी है तेरी भी है सबकी है
प्यार भरी मुस्कान है हिंदी।
जन जन के हृदय की झंकार है
साहित्य का गौरव गान है हिंदी।
ज्ञान प्रकाश चहुँ और फैलाती
सब भाषाओँ में महान है हिंदी।
मानवता का पाठ पढ़ाती है यह।
सकल गुणों की खान है हिंदी।
जन मानस में खुशहाली भरती
माँ भारत की प्रिय संतान है हिंदी।
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