अजीब शख्श था चाहत की बयार छोड़ गया
वह अपने इश्क में मुझे बीमार छोड़ गया।
मेरी नज़रों में नज़रे डाल कर के वह
फिर मिलके रहने का करार छोड़ गया।
उसे पता था तन्हा न रह सकूँगा मैं
यह हवा यह फिज़ा यह बहार छोड़ गया।
जिंदगी चाहत से ही तो चला करती है
दिल में यह सबक भी तैयार छोड़ गया।
आसमां हूँ तेरी प्यास बुझा दूंगा जरूर
वह वादों की फसल तैयार छोड़ गया।
मुझे खुद से ज्यादा यकीं उस पर हुआ
हर राह में एक मंजिल तैयार छोड़ गया।
मैंने देखा था जाने के बाद ख़त उसका
अपनी शायरी के अशआर छोड़ गया।
रस्मो रिवाज़ से घबरा गया था वह
मेरे हिस्से में लम्बी इंतज़ार छोड़ गया।
दिल की वादियाँ अँधेरे में डूब गयी थी
वह दूर जलते चिराग बेशुमार छोड़ गया।
Friday, September 10, 2010
खूबसूरती पर नज़र फिसल ही जाती है.
खूबसूरती पर नज़र फिसल ही जाती है
ओंठों से आह भी निकल ही जाती है।
कितना ही परहेज से रहा करे कोई
लजीज खाने पे नियत मचल ही जाती है।
सिंगार कितना भी अच्छा कर लिया हो
आइना देख कमी निकल ही जाती है।
वक़्त कितनी भी खुशियाँ बांटा करे
तकदीर अपनी चाल चल ही जाती है।
चुप रहने दे यार बहुत बोल लिए अब
ज्यादा बोलने से जुबां फिसल ही जाती है।
ओंठों से आह भी निकल ही जाती है।
कितना ही परहेज से रहा करे कोई
लजीज खाने पे नियत मचल ही जाती है।
सिंगार कितना भी अच्छा कर लिया हो
आइना देख कमी निकल ही जाती है।
वक़्त कितनी भी खुशियाँ बांटा करे
तकदीर अपनी चाल चल ही जाती है।
चुप रहने दे यार बहुत बोल लिए अब
ज्यादा बोलने से जुबां फिसल ही जाती है।
Wednesday, September 8, 2010
सिर से पाँव तक उसके चादर नहीं आई
सिर से पाँव तक उसके चादर नहीं आई
मुफिलिसी घर से कभी बाहर नहीं आई।
अच्छे दिनों की आस में उम्र कट गई सारी
महकती कोई भी रात बेहतर नहीं आई।
घर तो चमन के बहुतही करीब था उसका
हवा के साथ खुशबु कभी अन्दर नहीं आई।
रस्ते भी तो खोल दिए थे मेहनत ने सारे
तकदीर उसके करीब आकर नहीं आई।
जाने क्यूं अकेला वह सदा ही रह गया
परछाई भी कभी उसके बराबर नहीं आई।
मुफिलिसी घर से कभी बाहर नहीं आई।
अच्छे दिनों की आस में उम्र कट गई सारी
महकती कोई भी रात बेहतर नहीं आई।
घर तो चमन के बहुतही करीब था उसका
हवा के साथ खुशबु कभी अन्दर नहीं आई।
रस्ते भी तो खोल दिए थे मेहनत ने सारे
तकदीर उसके करीब आकर नहीं आई।
जाने क्यूं अकेला वह सदा ही रह गया
परछाई भी कभी उसके बराबर नहीं आई।
Sunday, September 5, 2010
किश्ती कागज की आती थी बनानी भूल गये
किश्ती कागज की आती थी बनानी भूल गये
बचपन की बातें सारी वह पुरानी भूल गये।
शराब दोस्त बन गयी इस हद तलक अपनी
बेवफा जिंदगी की सारी कहानी भूल गये ।
जग जग के कटा करती थी रात पलकों में
कभी सेज पर महकती थी जवानी भूल गये।
वक़्त से पहले आता था उमीदों का मानसून
जम कर कितना बरसता था पानी भूल गये।
किश्ती लडखडा गई थी हमारी जब से भंवर में
हम राहें वह सब जानी पहचानी भूल गये।
अब हम कहाँ तुम कहाँ वह रात कहाँ गई
मुहब्बत की वह बल खाती रवानी भूल गये।
वो मिलना मिलाना वह उठना बैठनासंग
भूले तो संग गलियों की कहानी भूल गये।
बचपन की बातें सारी वह पुरानी भूल गये।
शराब दोस्त बन गयी इस हद तलक अपनी
बेवफा जिंदगी की सारी कहानी भूल गये ।
जग जग के कटा करती थी रात पलकों में
कभी सेज पर महकती थी जवानी भूल गये।
वक़्त से पहले आता था उमीदों का मानसून
जम कर कितना बरसता था पानी भूल गये।
किश्ती लडखडा गई थी हमारी जब से भंवर में
हम राहें वह सब जानी पहचानी भूल गये।
अब हम कहाँ तुम कहाँ वह रात कहाँ गई
मुहब्बत की वह बल खाती रवानी भूल गये।
वो मिलना मिलाना वह उठना बैठनासंग
भूले तो संग गलियों की कहानी भूल गये।
हर दिल के तूफां को सैलाब कर दूंगा
हर दिल के तूफां को सैलाब कर दूंगा
मैं जब कईयों को बे नकाब कर दूंगा।
फिसाद करते हैं मिलके चुपके चुपके
मैं उन सबका जीना खराब कर दूंगा।
बदी पर अपनी उतर आऊँगा जब
बोतल में जो बंद है शराब कर दूंगा।
तुमने तहे दिल से पढ़ लिया मुझे तो
खुद को मैं खुली किताब कर दूंगा।
शहर में तेरे धरा क्या है कुछ तो बता
मेरे संग चल तुझे लाजवाब कर दूंगा।
हर सांस में महका करेगा खुशबु बन
मैं तुझे एक खिलता गुलाब कर दूंगा।
मैं जब कईयों को बे नकाब कर दूंगा।
फिसाद करते हैं मिलके चुपके चुपके
मैं उन सबका जीना खराब कर दूंगा।
बदी पर अपनी उतर आऊँगा जब
बोतल में जो बंद है शराब कर दूंगा।
तुमने तहे दिल से पढ़ लिया मुझे तो
खुद को मैं खुली किताब कर दूंगा।
शहर में तेरे धरा क्या है कुछ तो बता
मेरे संग चल तुझे लाजवाब कर दूंगा।
हर सांस में महका करेगा खुशबु बन
मैं तुझे एक खिलता गुलाब कर दूंगा।
आदमी कब क्या सोच ले पता नहीं.
आदमी कब क्या सोच ले पता नहीं
करता करता क्या कर बैठे पता नहीं।
वक़्त आदमी के मिजाज सा होता है
बनते बनते कब बिगड़ बैठे पता नहीं।
शहर तो कोई भी नहीं बदला उसने
हैं घर क्यों इतने बदले पता नहीं।
रहो उस के जो दिल को लगे अच्छा
वह क्यों बदलता है रिश्ते पता नहीं।
शहर रोशन करने का वादा था मगर
कहाँ उड़ गये गर्द बन के पता नहीं।
राजे-मुहब्बत दफ़न था दिल में जब
क्यों रोये गले लग के पता नहीं।
हमें तो खा गया दिल का जूनून
हुए हाथ क्यों उनके कलम पता नहीं।
करता करता क्या कर बैठे पता नहीं।
वक़्त आदमी के मिजाज सा होता है
बनते बनते कब बिगड़ बैठे पता नहीं।
शहर तो कोई भी नहीं बदला उसने
हैं घर क्यों इतने बदले पता नहीं।
रहो उस के जो दिल को लगे अच्छा
वह क्यों बदलता है रिश्ते पता नहीं।
शहर रोशन करने का वादा था मगर
कहाँ उड़ गये गर्द बन के पता नहीं।
राजे-मुहब्बत दफ़न था दिल में जब
क्यों रोये गले लग के पता नहीं।
हमें तो खा गया दिल का जूनून
हुए हाथ क्यों उनके कलम पता नहीं।
Wednesday, September 1, 2010
देखते देखते जमाने बदल गए
देखते देखते जमाने बदल गए
मेरी खुद्दारी के पैमाने बदल गए।
ख़ुशी गम होते हैं अब भी मगर
उनके होने के बहाने बदल गए।
बढ़ गई दीवानगी इस हद तलक
खाका ए पैरहन पुराने बदल गए।
अह्सासे जियां भी वह नहीं रहा
हकीकते दस्तूरे मैखाने बदल गए।
खड़े सिरहाने पे आके मेरे क्यों हो
गले लगने के वे जमाने बदल गए।
नींद जब से आने लगी है हमें कम
सोने के हमारे सिरहाने बदल गए।
पलकों में रख लिया है जब से उन्हें
रहने के अपने ठिकाने बदल गए।
चेहरा नया नहीं है कोई भी मगर
इन्सान क्यों न जाने बदल गए ।
मेरी खुद्दारी के पैमाने बदल गए।
ख़ुशी गम होते हैं अब भी मगर
उनके होने के बहाने बदल गए।
बढ़ गई दीवानगी इस हद तलक
खाका ए पैरहन पुराने बदल गए।
अह्सासे जियां भी वह नहीं रहा
हकीकते दस्तूरे मैखाने बदल गए।
खड़े सिरहाने पे आके मेरे क्यों हो
गले लगने के वे जमाने बदल गए।
नींद जब से आने लगी है हमें कम
सोने के हमारे सिरहाने बदल गए।
पलकों में रख लिया है जब से उन्हें
रहने के अपने ठिकाने बदल गए।
चेहरा नया नहीं है कोई भी मगर
इन्सान क्यों न जाने बदल गए ।
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